JTET नियमावली पर सुदिव्य सोनू का कड़ा प्रहार: बोले– “बोली और भाषा का अंतर समझें अफसर, झारखंड में बाहरी भाषाओं से नहीं छीनने देंगे स्थानीय बच्चों का हक”

Ranchi: झारखंड शिक्षक पात्रता परीक्षा (JTET) की नई नियमावली को लेकर राज्य में भाषाई राजनीति एक बार फिर गरमा गई है. क्षेत्रीय...

Ranchi: झारखंड शिक्षक पात्रता परीक्षा (JTET) की नई नियमावली को लेकर राज्य में भाषाई राजनीति एक बार फिर गरमा गई है. क्षेत्रीय और जनजातीय भाषाओं की सूची से भोजपुरी, मगही और अंगिका को बाहर किए जाने पर विपक्ष और कुछ संगठनों द्वारा लगातार विरोध जताया जा रहा था. इस पूरे विवाद पर अब सत्ताधारी दल के मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू का बेबाक बयान सामने आया है, जिसने इस नीति को लेकर सरकार की मंशा पूरी तरह साफ कर दी है.

अफसरों ने गलत तरीके से भाषाओं को सूची में शामिल कराया: सुदिव्य कुमार सोनू

सुदिव्य कुमार सोनू ने सीधे तौर पर राज्य की ब्यूरोक्रेसी को कटघरे में खड़ा किया है. उन्होंने पूर्व के घटनाक्रमों पर निशाना साधते हुए कहा कि पहले के समय में अधिकारियों, ब्यूरोक्रेट्स और अफसरों ने अपनी मनमानी और गलत समझ के कारण मगही, भोजपुरी और अंगिका को झारखंड की क्षेत्रीय भाषाओं की सूची में शामिल करवा दिया था. उन्होंने साफ कहा कि ये भाषाएं ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से झारखंड की भाषाएं कभी थीं ही नहीं, बल्कि इन्हें जबरन यहां की व्यवस्था पर थोपा गया था.

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बोली और भाषा का फर्क समझना जरूरी

अपने बयान का तर्क देते हुए सुदिव्य सोनू ने कहा कि लोगों को ‘बोली’ बोलना और ‘भाषा’ होना, इन दोनों के मूल अंतर को गहराई से समझना होगा. हर क्षेत्र में स्थानीय स्तर पर कोई न कोई बोली बोली जाती है, लेकिन इसका मतलब यह कटई नहीं है कि उसे राज्य की मुख्य प्रशासनिक और अकादमिक भाषा मान लिया जाए. उन्होंने स्पष्ट किया कि झारखंड की अपनी विशिष्ट जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाएं हैं, जिनकी रक्षा करना सरकार का पहला कर्तव्य है.

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जेएमएम की नीति दोहराई

मंत्री ने चेतावनी देते हुए कहा कि अगर जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाओं की सूची में मगही, अंगिका और भोजपुरी जैसी बाहरी भाषाओं को शामिल रखा जाता है, तो यह झारखंड के मूल निवासी और आदिवासी बच्चों के भविष्य के साथ सरासर अन्याय होगा. इसके कारण यहां के योग्य अभ्यर्थी अपने ही राज्य में रोजगार से वंचित हो जाएंगे, जिसे किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जा सकता. पार्टी के मूल सिद्धांतों को दोहराते हुए सुदिव्य सोनू ने कहा कि झारखंड मुक्ति मोर्चा का गठन ही यहां के लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए हुआ है. जेएमएम हमेशा से इस नीति की पुरजोर पक्षधर रही है कि झारखंड की सरकारी नौकरियों और संसाधनों पर पहला और शत-प्रतिशत अधिकार सिर्फ और सिर्फ यहीं के माटी के बच्चों का होना चाहिए.

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