सिस्टम की ‘चुप्पी’ या तस्करों से ‘साठगांठ’? महिला तस्कर की मौत के बाद बिना पोस्टमार्टम अंतिम संस्कार ने खड़े किए सवाल

Hazaribagh: जिले के बंशीलाल चौक पर ब्राउन शुगर के खिलाफ हुई पुलिसिया छापेमारी अब एक बड़े विवाद और संदेह के घेरे में...

Hazaribagh: जिले के बंशीलाल चौक पर ब्राउन शुगर के खिलाफ हुई पुलिसिया छापेमारी अब एक बड़े विवाद और संदेह के घेरे में है. पुलिस के सामने ही साक्ष्य मिटाने के लिए नशीला पदार्थ निगलने वाली महिला की मौत के बाद जिस तरह से नियमों की धज्जियां उड़ाई गईं, उसने न केवल पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगा दिया है, बल्कि विभाग की भूमिका को भी संदिग्ध बना दिया है.

पुलिस की मौजूदगी में कैसे ‘गायब’ हुआ केस?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब छापेमारी पुलिस की टीम ने की और महिला ने पुलिस के सामने ही ब्राउन शुगर निगली, तो मौत के बाद शव का कानूनी रास्ता क्यों नहीं बदला? अस्पताल में डॉक्टरों ने महिला को मृत घोषित किया, लेकिन वहां से शव को पुलिस के हवाले करने के बजाय परिजनों को कैसे सौंप दिया गया?

कानूनी प्रक्रिया पर उठे सवाल

कानून कहता है कि छापेमारी के दौरान हुई मौत ‘कस्टोडियल डेथ’ की श्रेणी में आती है, फिर पुलिस ने पोस्टमार्टम की प्रक्रिया को दरकिनार क्यों होने दिया?

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अस्पताल से मुक्तिधाम तक का सफर बना चर्चा का विषय

महिला को शहर के एक नामी अस्पताल ले जाया गया और वहां से सीधे हजारीबाग मुक्तिधाम पहुंचाकर दाह संस्कार कर दिया गया. इस पूरी प्रक्रिया के दौरान पुलिस का ‘मौन’ रहना किसी बड़ी सांठगांठ की ओर इशारा कर रहा है.

क्या किसी बड़े नेटवर्क को बचाने की कोशिश?

सूत्रों का कहना है कि अगर पोस्टमार्टम होता, तो महिला के पेट से बरामद ब्राउन शुगर की मात्रा और उसकी शुद्धता बड़े माफियाओं तक पुलिस के हाथ पहुंचा सकती थी. क्या किसी ‘सफेदपोश’ को बचाने के लिए ही पुलिस ने इस मामले में ढिलाई बरती?

इलाके में तेज हुई चर्चाएं

हजारीबाग के गलियारों में अब यह चर्चा आम है कि क्या पुलिस ने जानबूझकर इस मामले को रफा-दफा होने दिया. छापेमारी करने वाली टीम अब तक किसी लिखित शिकायत या सूचना न मिलने का बहाना बना रही है, जबकि पूरी घटना उनकी आंखों के सामने घटी. पुलिस की यह निष्क्रियता शहर में नशा माफियाओं के बढ़ते हौसलों का सबसे बड़ा कारण बनती जा रही है।

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