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शाम ढले अब नहीं गूंजती बादुर की सरसराहट, नई पीढ़ी पहचानती नहीं, पुरानी पीढ़ी बचाने को बेताब; अनदेखी से विलुप्ति के कगार पर दुर्लभ जीव

Hazaribagh : बदलते पर्यावरण और इंसानी लालच के कारण एक अनोखा पारिस्थितिक आशियाना उजड़ने की कगार पर है. इलाके में कभी हजारों...

Hazaribagh : बदलते पर्यावरण और इंसानी लालच के कारण एक अनोखा पारिस्थितिक आशियाना उजड़ने की कगार पर है. इलाके में कभी हजारों की तादाद में रहने वाले दुर्लभ बादुर आज अपनी आखिरी सांसें गिन रहे हैं. लोक आस्था में लक्ष्मी और सौभाग्य का प्रतीक माने जाने वाले इन बेजुबान जीवों का कथित औषधियां बनाने के नाम पर धड़ल्ले से अवैध शिकार किया जा रहा है. टाटीझरिया के डहरभंगा गांव के ग्रामीणों ने बताया कि वर्षों पहले गांव के विशाल पांकर-पीपल पेड़ पर इनकी आबादी हजारों में हुआ करती थी. बुजुर्ग याद करते हुए भावुक हो जाते हैं और कहते हैं, एक दौर था जब इस पेड़ पर जितने पत्ते नहीं थे, उससे कहीं ज्यादा बादुर लटके दिखाई देते थे. लेकिन आज स्थिति बिल्कुल उलट है. अब इनकी संख्या उंगलियों पर गिनने लायक रह गई है. चमगादड़ और तोता की मिश्रित फितरत वाले इस पक्षी को लेकर क्षेत्र के बुजुर्गों में गहरी आस्था है. ग्रामीण बताते हैं कि बादुर को सुख, संपत्ति और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है. लोकोक्ति है कि यह पक्षी जिस स्थान या घर में वास करता है, वहां कभी दरिद्रता नहीं आती और साक्षात लक्ष्मी की कृपा बरसती है. चमगादड़ की तरह ही ये ऊंचे पेड़ों की टहनियों से उल्टे लटके रहते हैं. डहरभंगा के ग्रामीण इन्हें अपने क्षेत्र की समृद्धि का रखवाला मानते हैं.

शिकार और अंधविश्वास बढ़ा रहा है संकट, संरक्षण की गुहार

बादुर की आबादी घटने के पीछे सिर्फ पर्यावरण में बदलाव ही इकलौता कारण नहीं है. इस विलुप्तप्राय पक्षी के अस्तित्व पर सबसे बड़ा खतरा इंसानी लालच बन गया है. कुछ लोग पारंपरिक और कथित चमत्कारी औषधि तैयार करने के नाम पर इन बेजुबान और दुर्लभ पक्षियों का अवैध शिकार कर रहे हैं. सच्चाई और मान्यताएं चाहे जो भी हों, लेकिन वैज्ञानिक और पर्यावरणीय दृष्टिकोण से इस अनूठी प्रजाति का बचना बेहद जरूरी है. डहरभंगा के ग्रामीणों ने मांग की है कि इस पेड़ और यहां बचे हुए बादुरों को संरक्षित घोषित किया जाए, ताकि हमारी आने वाली पीढ़ी इस अद्भुत जीव को सिर्फ किताबों में न देखे.

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