Prashant Sharma

हजारीबाग : कोयलांचल की काली धूल में हर दिन कई कहानियां जन्म लेती हैं, कुछ मेहनत और संघर्ष की तो कुछ अंधेरे में खो जाने वाली. रामगढ़ के कुख्यात राहुल दुबे गैंग से जुड़े सन्नी सिंह की कहानी भी ऐसी ही उलझी हुई कहानी है, जो कई सवाल छोड़ जाती है. छपरा से आए एक साधारण परिवार में जन्मे सन्नी के पिता रोजी-रोटी की तलाश में रेलीगढ़ा के चांदनी चौक में बस गए थे. घर की जिम्मेदारियों के बीच सन्नी ने कम उम्र में ही काम संभाल लिया और कोयला व्यवसाय में लिफ्टिंग का काम करने लगा.
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मेहनत के बीच मोहभंग, आसान रास्ते का आकर्षण
दिनभर की मेहनत के बावजूद आर्थिक तंगी, अपमान और अनिश्चित भविष्य ने उसे भीतर से तोड़ना शुरू कर दिया. इसी दौरान उसके सामने एक दूसरा रास्ता खुला, जहां मेहनत कम और पैसा व दबदबा ज्यादा था. धीरे-धीरे उसने उसी रास्ते को चुन लिया और अपराध की दुनिया में कदम रख दिया. कुछ ही समय में वह राहुल दुबे गैंग से जुड़ गया और एक साधारण मजदूर से अपराध जगत का जाना-पहचाना नाम बन गया.
जेल, वापसी और फिर वही अंधेरा
अपराध की दुनिया में तेजी से बढ़ते कदम आखिरकार उसे जेल तक ले गए. अक्टूबर 2025 में जेल से बाहर आने के बाद भी वह उस दुनिया से खुद को अलग नहीं कर सका. गैंग का दबाव, पुरानी आदतें और आसान कमाई का लालच उसे फिर उसी रास्ते पर ले गया. हाल ही में भुरकुंडा के रिवर साइड शिव मंदिर परिसर में पुलिस मुठभेड़ के दौरान गोली लगने से वह घायल हो गया और फिलहाल सदर अस्पताल में उसका इलाज चल रहा है.
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एक कहानी, कई सवाल और समाज के लिए आईना
सन्नी सिंह की कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस समाज का आईना है जहां संघर्ष और अवसर के बीच की खाई कई युवाओं को गलत दिशा में धकेल देती है. सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वह जन्म से अपराधी था या हालात ने उसे इस रास्ते पर ला खड़ा किया. जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते, तब तक कोयलांचल की धूल में ऐसी कहानियां यूं ही जन्म लेती रहेंगी.
