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हजारीबाग-कोलकाता सीधी ट्रेन का इंतजार क्यों? करोड़ों कमाने वाले रेल रूट पर यात्रियों की उम्मीद अब भी अधूरी

Hazaribagh: शाम के सात बजते ही हज़ारीबाग के बस स्टैंड पर एक अजीब-सी अफरा-तफरी दिखने लगती है. चमचमाती हुई स्लीपर और वोल्वो...

हजारीबाग-कोलकाता सीधी ट्रेन का इंतजार
हजारीबाग-कोलकाता सीधी ट्रेन का इंतजार

Hazaribagh: शाम के सात बजते ही हज़ारीबाग के बस स्टैंड पर एक अजीब-सी अफरा-तफरी दिखने लगती है. चमचमाती हुई स्लीपर और वोल्वो बसों के एजेंट ‘कोलकाता-कोलकाता’ की आवाज़ें लगाने लगते हैं. खिड़की पर खड़े मिडिल क्लास (Middle Class) पिता की जेब से जब वोल्वो बस के लिए ₹1700 का नोट निकलता है, तो उसका पूरा बजट चरमरा जाता है. मजबूरी है, कोलकाता में बच्चे की पढ़ाई हो या मेडिकल इमरजेंसी (Medical Emergency), जाना तो है ही. लेकिन इसी चीख-पुकार और मजबूरी से ठीक 5 किलोमीटर दूर, हज़ारीबाग टाउन रेलवे स्टेशन पर एक अजीब-सी खामोशी पसरी होती है. एक ऐसा रेलवे स्टेशन, जिसके पास से हर दिन लगभग 35 मालगाड़ियां एनटीपीसी (NTPC) का कोयला लादकर रेंगती हुई निकल जाती हैं. रेलवे के खाते में हर रोज़ करोड़ों का राजस्व (Revenue) जमा होता है, लेकिन जब कोई आम मुसाफिर काउंटर पर जाकर पूछता है, “बाबू, कोलकाता जाने के लिए कोई सीधी ट्रेन है क्या?” तो जवाब मिलता है- “नहीं, एक भी नहीं.”

आखिर ऐसा क्यों?

कोडरमा-हज़ारीबाग-बरकाकाना रेल लाइन बनने के इतने सालों बाद भी इस रूट को एक अदद ‘हज़ारीबाग-कोलकाता नाइट एक्सप्रेस’ क्यों नहीं मिल पा रही है? आइए, इसके पीछे के कड़वे सच, रेलवे की अंदरूनी राजनीति और हज़ारीबाग में चल रहे रेलवे के सबसे बड़े प्रोजेक्ट की ‘डीप रिसर्च’ परत-दर-परत खोलते हैं.

क्यों अटकी सीधी ट्रेन?

जब हमने रेलवे के अंदरूनी सूत्रों, टाइम-टेबल एक्सपर्ट्स और इस रूट पर नज़र रखने वाले लोगों से बात की, तो सबसे बड़ी तकनीकी और प्रशासनिक वजहें सामने आईं. इसमें पहला बड़ा रोड़ा एनटीपीसी के कोयले का भारी दबाव है. यह कोई सीक्रेट नहीं है कि कोडरमा-हज़ारीबाग-पिंड्रा-बरकाकाना रूट भारतीय रेलवे के लिए ‘सोने का अंडा देने वाली मुर्गी’ है. इस रूट पर चलने वाली करीब 35 मालगाड़ियां एनटीपीसी के बड़े कोयला खदानों से भारी मात्रा में कोयला लेकर देश के अलग-अलग पावर प्लांट्स और बंदरगाहों तक जाती हैं. रेलवे की पहली प्राथमिकता माल ढुलाई है, क्योंकि इससे सबसे अधिक निश्चित कमाई होती है. एक नई पैसेंजर या एक्सप्रेस ट्रेन डालने का मतलब है मालगाड़ियों के पूरे ‘स्लॉट’ को प्रभावित करना, जिसे रेलवे बोर्ड टालता आ रहा है. दूसरा बड़ा कारण टर्मिनल कंजेशन (Terminal Congestion), यानी हावड़ा-सियालदह में जगह की भारी कमी है. कोडरमा से आगे धनबाद और आसनसोल का पूरा रेल रूट पहले से ही क्षमता से अधिक व्यस्त है. इसके अलावा, कोलकाता के हावड़ा, सियालदह या शालीमार स्टेशनों पर नई ट्रेनों को प्लेटफॉर्म देने की भारी कमी है. जब भी इस रूट से नई ट्रेन का प्रस्ताव जाता है, पूर्व रेलवे टर्मिनस पर जगह नहीं होने की बात कहकर फाइल वापस भेज देता है. इसके साथ ही ‘बस लॉबी’ का अदृश्य राजनीतिक दबाव भी एक बड़ा कारण माना जाता है. हज़ारीबाग से कोलकाता रूट पर रोज़ाना 8 से 10 प्रीमियम बसें चलती हैं. अगर औसतन एक बस में 40 यात्री भी बैठते हैं और किराया ₹1500 मान लिया जाए, तो यह रोज़ाना लाखों रुपये का सीधा कारोबार है. जनता के बीच यह कयास लंबे समय से हैं कि शक्तिशाली प्राइवेट बस सिंडिकेट और ट्रांसपोर्ट माफिया कभी नहीं चाहते कि इस रूट पर कोई सस्ती नाइट ट्रेन शुरू हो.

41 करोड़ का कोचिंग डिपो

इस पूरी समस्या के बीच हज़ारीबाग के लिए एक बहुत बड़ी उम्मीद की किरण भी है, जिसकी जानकारी आम जनता को कम है. हज़ारीबाग टाउन रेलवे स्टेशन पर रेलवे की ओर से ₹41 करोड़ की लागत से ‘यार्ड कोचिंग कॉम्प्लेक्स (Yard Coaching Complex)’ का निर्माण कार्य तेज़ी से चल रहा है. किसी भी नए रूट पर लंबी दूरी की मेल या एक्सप्रेस ट्रेनें तब तक शुरू नहीं की जा सकतीं, जब तक वहां ट्रेनों के रखरखाव, साफ-सफाई और मरम्मत के लिए ‘वाशिंग पिट लाइन’ और कोचिंग यार्ड न हो. अब तक ट्रेनों के मेंटेनेंस के लिए हज़ारीबाग को धनबाद या बरकाकाना जैसे दूरस्थ हब पर निर्भर रहना पड़ता था. रेलवे के एक्सपर्ट्स का कहना है कि इस यार्ड कोचिंग कॉम्प्लेक्स के पूरी तरह तैयार होते ही हज़ारीबाग टाउन स्टेशन से नई ट्रेनें शुरू करने और लंबी दूरी की ट्रेनों को यहीं से टर्मिनेट (Terminate) करने की राह पूरी तरह साफ हो जाएगी. यानी तकनीकी रूप से जो रोड़ा अब तक अटका हुआ था, वह इस कोचिंग डिपो के बनते ही दूर हो जाएगा.

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आंकड़े क्या कहते हैं?

रेलवे और प्राइवेट ट्रांसपोर्ट के खर्च के बीच का अंतर इतना बड़ा है कि कोई भी हैरान रह जाए. जहां प्राइवेट वोल्वो या स्लीपर बस से सफर करने पर प्रति व्यक्ति ₹1400 से ₹1700 तक खर्च आता है, वहीं अत्यधिक किराया देने के बाद भी समय पर पहुंचने की कोई गारंटी नहीं होती और सुरक्षा का खतरा भी बना रहता है. इसके विपरीत रेलवे की स्लीपर क्लास से यात्रा करने पर मात्र ₹300 (लगभग) में आरामदायक और सुरक्षित सफर संभव है. वहीं रेलवे के 3AC क्लास का संभावित खर्च ₹700 से ₹800 (लगभग) बैठता है, जो परिवारों और बुजुर्गों के लिए बस के मुकाबले आधे खर्च में वातानुकूलित यात्रा का बेहतर विकल्प है.

जनता का सवाल

हज़ारीबाग के लोगों और स्थानीय एक्टिविस्ट्स का कहना है कि जब केंद्र सरकार ने ₹41 करोड़ खर्च कर यहां कोचिंग डिपो की आधारशिला रख दी है और निर्माण कार्य आगे बढ़ रहा है, तो स्थानीय जनप्रतिनिधि और सांसद अभी से रेल मंत्रालय पर दबाव बनाकर हज़ारीबाग-कोलकाता नाइट एक्सप्रेस के स्लॉट को सुरक्षित क्यों नहीं करवा रहे हैं? स्थानीय एक्टिविस्ट्स का कहना है कि जनता को अब लॉलीपॉप नहीं, बल्कि ठोस तारीख चाहिए कि यह कोचिंग कॉम्प्लेक्स कब तक पूरा होगा और कोलकाता के लिए पहली नाइट ट्रेन कब पटरी पर दौड़ेगी.

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