Hazaribagh: यह महज कुछ लोहे की मशीनों के सड़ने की खबर नहीं है, बल्कि यह कहानी है हजारीबाग के उन हजारों अन्नदाताओं के टूटे भरोसे की, जिन्हें आधुनिक खेती का सपना दिखाकर व्यवस्था ने एक ठंडी कोठरी में धकेल दिया. सरकार हर साल विधानसभा से लेकर अखबारों के विज्ञापनों तक करोड़ों रुपये के बजट का ढिंढोरा पीटती है. दावा किया जाता है कि गांवों तक आधुनिक तकनीक पहुंचेगी, किसानों की मेहनत आधी होगी और मुनाफा दोगुना होगा. लेकिन इन दावों के पीछे का कड़वा और खौफनाक सच देखना हो, तो हजारीबाग के दीपुगढ़ा स्थित जिला कृषि कार्यालय परिसर चले आइए. यहां कदम रखते ही आपको विकास के दावों के पीछे छिपी प्रशासनिक उदासीनता की वो डरावनी तस्वीर दिखेगी, जो किसी भी संवेदनशील नागरिक को भीतर तक झकझोर देगी.
कटीली झाड़ियों का पहरा और बेदम होती करोड़ों की सरकारी संपत्ति
दीपूगढ़ा का यह दफ्तर इस वक्त एक ऐसा कब्रिस्तान बन चुका है जहां किसानों की तरक्की के साधन लावारिस पड़े-पड़े दम तोड़ रहे हैं. लाखों-करोड़ों रुपये की लागत से खरीदे गए आधुनिक कृषि उपकरण, जिनमें आलू बोने की मशीनें और अन्य अत्याधुनिक यंत्र शामिल हैं, कई वर्षों से खुले आसमान के नीचे छोड़ दिए गए हैं. जैसा कि चित्र में साफ दिखाई दे रहा है, जो मशीनें इस वक्त खेतों की मिट्टी चीरकर सोना उगा रही होनी चाहिए थीं, उन पर आज कटीली झाड़ियों ने अपना कब्जा जमा लिया है. तेज धूप, मूसलाधार बारिश और बदलते मौसम की बेरहम मार ने इन चमचमाती गाड़ियों को जंग के गहरे लाल रंग में रंग दिया है. कई मशीनों के पुर्जे इस कदर गल चुके हैं कि वे अब सिर्फ लोहा बेचने वाले कबाड़ियों के काम के रह गए हैं.

विडंबना: परंपरा के भरोसे जी रहा किसान, दफ्तर में सड़ रहे संसाधन
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा सस्पेंस और विडंबना यह है कि एक तरफ जिले का गरीब, सीमांत और छोटा किसान आज भी कर्ज के बोझ तले दबा हुआ है. वह महंगे यंत्र न खरीद पाने के कारण कड़कड़ाती धूप और हाड़ कंपाने वाली ठंड में अपने बैलों या पुराने पारंपरिक औजारों के सहारे खून-पसीना बहाने को मजबूर है. उसकी लागत बढ़ रही है और मुनाफा घट रहा है. वहीं दूसरी तरफ, उसकी सहूलियत के लिए सरकारी खजाने यानी आम जनता के टैक्स के पैसे से खरीदी गई ये बहुमूल्य मशीनें अफसरों की नाक के नीचे सड़ रही हैं. कृषि विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि इन महंगे उपकरणों का समय पर वितरण न होना सीधे तौर पर वित्तीय अपराध की श्रेणी में आता है, क्योंकि लंबे समय तक खुले में रहने से इनकी कार्यक्षमता और गुणवत्ता पूरी तरह शून्य हो जाती है.
“मेरे समय का नहीं है मामला”- पल्ला झाड़कर बैठ गए साहब
जब इस महालापरवाही और सरकारी धन की खुली लूट को लेकर वर्तमान संयुक्त कृषि निदेशक अशोक सम्राट के केबिन का दरवाजा खटखटाया गया, तो उनका जवाब तंत्र की रही-सही उम्मीदों पर भी पानी फेरने जैसा था. उन्होंने बेहद सहजता से अपना पल्ला झाड़ते हुए कहा कि ये सारे उपकरण उनके प्रभार संभालने से बहुत पहले से ही यहां दीपुगढ़ा परिसर में डंप पड़े हैं, इसलिए उनके पास इसकी कोई विस्तृत या पुख्ता जानकारी नहीं है. हालांकि, उन्होंने इतना जरूर जोड़ा कि वे मामले की फाइलें मंगवाकर इसकी जांच करवाएंगे और जरूरी कदम उठाएंगे. लेकिन सवाल यह उठता है कि जब तक यह कागजी जांच पूरी होगी, तब तक क्या ये बची-खुची मशीनें पूरी तरह मिट्टी में नहीं मिल जाएंगी?
अब आक्रोश में अन्नदाता: जांच और सीधे कार्रवाई की पुरजोर मांग
इस कबाड़खाने की तस्वीर सामने आने के बाद हजारीबाग के किसान संगठनों और स्थानीय ग्रामीणों में गहरा आक्रोश व्याप्त है. किसानों ने दो टूक शब्दों में प्रशासन से मांग की है कि दीपुगढ़ा कार्यालय परिसर का तुरंत भौतिक सत्यापन कराया जाए और बेकार पड़े सभी यंत्रों की एक आधिकारिक सूची सार्वजनिक की जाए. जो मशीनें थोड़ी बहुत मरम्मत के बाद चलने लायक हैं, उन्हें बिना किसी देरी के पारदर्शी तरीके से जरूरतमंद किसानों के बीच मुफ्त या अनुदान पर बांट दिया जाए. इसके साथ ही, किसानों ने मुख्यमंत्री और उच्च स्तरीय जांच एजेंसियों से यह गुहार भी लगाई है कि इतने वर्षों तक इन कीमती संसाधनों को दबाकर रखने वाले, फाइलों को दबाने वाले और सरकारी संपत्ति को जानबूझकर नष्ट करने वाले दोषी अधिकारियों को चिह्नित कर उनके खिलाफ सख्त दंडात्मक और कानूनी कार्रवाई की जाए, ताकि भविष्य में जनता की गाढ़ी कमाई के साथ ऐसा भद्दा मजाक दोबारा न हो सके.
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