News Wave Desk: बिहार में अब पलटने की परंपरा पर विराम लगेगा या सम्राट भी उसी फेविकोल की तलाश करेंगे, जिसे नीतीश कुमार ने बरसों इस्तेमाल किया. फिलहाल, जनता सिर्फ यही कह रही है, महाराज, पगड़ी तो खुल गई, अब विकास का दरवाजा भी खोल दीजिए. बिहार की राजनीति में आखिरकार वह दिन आ ही गया, जिसकी पटकथा लिखने के लिए चाणक्य भी अपना सिर खुजला रहे थे. बरसों से सत्ता के गलियारों में नीतीश कुमार नामक जो फेविकोल का जोड़ लगा था, वह अब उखड़ चुका है.

इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया नीतीश राज
बिहार की राजनीति के मौसम वैज्ञानिक और कुर्सी से ऐसे चिपके रहने वाले जैसे चुंबक से लोहा, नीतीश कुमार का राज अब इतिहास के पन्नों में या शायद फिर से पलटने वाली किसी डायरी में दर्ज हो गया है. बिहार की कमान अब सम्राट चौधरी के हाथों में है. वह सम्राट, जिन्होंने कसम खाई थी कि जब तक नीतीश को सत्ता से नहीं हटाएंगे, तब तक सिर से मुरेठा नहीं उतारेंगे.
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इस्तीफे का साइड इफेक्ट और सुशासन का विसर्जन
नीतीश कुमार के इस्तीफे के साथ ही उस सुशासन के युग का अंत हो गया है, जिसमें यह पता लगाना मुश्किल था कि नीतीश कुमार भाजपा के साथ गठबंधन में हैं या विपक्षी गठबंधन के साथ डेटिंग कर रहे हैं. बिहार की जनता अब यह सोचकर हैरान है कि क्या अब वाकई पाला बदलने का खेल बंद होगा. सम्राट चौधरी के कंधों पर अब उस बिहार की जिम्मेदारी है, जहां विकास की रफ्तार से ज्यादा नेताओं के बयानवीर होने की चर्चा रहती है.

सम्राट का राज : चुनौतियों का कांटों भरा ताज
सम्राट चौधरी के लिए यह जीत केवल सत्ता नहीं, बल्कि साख का सवाल है. जिस भाजपा ने सालों तक नीतीश के पीछे रहकर राजनीति की, क्या अब वह फ्रंट फुट पर आकर छक्का मार पाएगा. लालू परिवार की लालटेन अब सम्राट के महल में अंधेरा करने के लिए पूरी ताकत झोंक देगी.
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कुर्सी वही, किरदार नए
बिहार की राजनीति में चेहरा बदलता है, पर चरित्र वही रहता है. नीतीश बाबू ने इतनी बार शपथ ली है कि राजभवन के कर्मचारियों को अब उनका नाम टाइप करने के लिए कीबोर्ड की जरूरत नहीं पड़ती, बस कॉपी-पेस्ट से काम चल जाता था. अब सम्राट चौधरी को यह साबित करना होगा कि वह किंगमेकर से किंग बनने के बाद बिहार को सच में सम्राट जैसा गौरव दिला पाएंगे या फिर यह भी बस अगले चुनाव तक की एक शॉर्ट फिल्म है.
