Ranchi: पिछले 14 वर्षों यानी चार सितंबर 2012 से लेकर अब तक राज्य प्रशासनिक सेवा के 85 अफसर घूसखोरी के दलदल में फंसे और रंगे हाथ गिरफ्तार भी किए गए. इन अफसरों पर घूस लेने और पद के दुरुपयोग के संगीन आरोप लगे. इन 14 वर्षों में राज्य के विभिन्न जिलों में तैनात राज्य प्रशासनिक सेवा के 150 से अधिक अधिकारियों, जिनमें अंचल अधिकारी, आपूर्ति पदाधिकारी और बीडीओ शामिल हैं, को भ्रष्टाचार के अलग-अलग आरोपों में एसीबी के रडार पर लिया गया. इन मामलों में 60 फीसदी से अधिक गिरफ्तारियां अंचल कार्यालयों से हुई हैं, जहां जमीन के दाखिल-खारिज और मापी के नाम पर रिश्वतखोरी का खेल सबसे अधिक है. शेष 40 फीसदी मामलों में प्रखंड आपूर्ति कार्यालय और विकास कार्यों से जुड़े अधिकारी शामिल हैं.
85 अफसर एसीबी के हत्थे चढ़े
2012 से लेकर अब तक 85 से अधिक ऐसे प्रशासनिक अधिकारी, जिनमें अंचल अधिकारी, प्रखंड विकास अधिकारी, भू-अर्जन पदाधिकारी और अनुमंडल पदाधिकारी स्तर के अधिकारी शामिल हैं, को एसीबी ने घूस लेते रंगे हाथ दबोचा. नोटों की गड्डियों के साथ पकड़े जाने के बाद इन रंगे हाथ गिरफ्तार अफसरों को न सिर्फ जेल की सलाखों के पीछे जाना पड़ा, बल्कि इन्हें तत्काल प्रभाव से निलंबित भी कर दिया गया.
अंचल और प्रखंड बने लूट के केंद्र
रंगे हाथों पकड़े गए झारखंड प्रशासनिक सेवा के अफसरों में लगभग 60 फीसदी अंचल अधिकारी या राजस्व अधिकारी शामिल हैं. उन्होंने आम जनता से उनकी अपनी ही जमीन के म्यूटेशन (दाखिल-खारिज), खतियान सुधार या लीज रिन्यूअल के एवज में हजारों से लेकर लाखों रुपये तक की सीधी घूस मांगी. हालिया मामलों में हजारीबाग सदर के पूर्व सीओ शैलेश कुमार रिश्वत लेते पकड़े गए, जिसके बाद उन्हें अक्टूबर 2025 में सलाखों के पीछे भेज दिया गया और सरकार ने उन्हें निलंबित कर दिया. इसी तरह बुंडू, नामकुम और अनगड़ा जैसे संवेदनशील अंचलों में तैनात रहे कई सीओ 2012 के बाद एसीबी के बिछाए जाल में 50 हजार से लेकर 2 लाख रुपये तक की नकद घूस लेते रंगे हाथ धरे जा चुके हैं.
विकास योजनाओं में कट-मनी
प्रखंड विकास पदाधिकारियों और जिला कल्याण पदाधिकारियों पर भी घूसखोरी का तगड़ा रंग चढ़ा. मनरेगा, प्रधानमंत्री आवास योजना और अनुसूचित जाति-जनजाति कल्याण योजनाओं के फंड को क्लियर करने के नाम पर ठेकेदारों और गरीब ग्रामीणों से सीधे कमीशनखोरी की गई. कई बीडीओ को उनके सरकारी आवास या निजी कार्यालयों से घूस की रकम लेते हुए एसीबी ने गिरफ्तार किया.
कागजों की हेराफेरी से लेकर डिजिटल घूसखोरी तक
वर्ष 2012 से पहले जहां घूसखोरी सिर्फ नकद लेन-देन तक सीमित थी, वहीं पिछले एक दशक में इन अफसरों ने घूस लेने के बेहद शातिर और आधुनिक तरीके इजाद कर लिए. अधिकांश अधिकारी अब सीधे पैसे न लेकर अपने निजी बॉडीगार्ड, अंचल के कंप्यूटर ऑपरेटर या किसी खास दलाल (सिंडिकेट) के जरिए घूस की रकम ठिकाने लगवाने लगे.
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फर्जी लॉगबुक और वित्तीय अनियमितता
सरकार की हालिया कार्रवाइयों से साफ है कि कई अधिकारी, जैसे राजीव कुमार मिश्रा (पूर्व कार्यपालक पदाधिकारी, महागामा), पर न केवल वित्तीय गड़बड़ियों के आरोप लगे, बल्कि सरकारी संसाधनों, जैसे जेसीबी मशीन, का अवैध व्यावसायिक उपयोग करने और सरकारी राजस्व को निजी जेबों में भरने के संगीन मामले भी सामने आए.
दायित्वों से भागना और अनुशासनहीनता
घूसखोरी के साथ-साथ इन अफसरों में काम के प्रति घोर लापरवाही भी देखी गई. पदस्थापन के बाद महीनों तक योगदान नहीं देना, फाइलों को दबाकर रखना ताकि सामने वाला पक्ष परेशान होकर मोटी रकम देने पर मजबूर हो जाए, राज्य सेवा अधिकारियों की कार्यशैली का हिस्सा बन चुका था. प्रभात कुमार (पूर्व एलआरडीसी, जामताड़ा) जैसे कई मामलों में विभाग की चार्जशीट से यह तथ्य उजागर हो चुका है.
