रांचीः सरहुल प्रकृति और मानव के गहरे संबंध का प्रतीक है. साल वृक्ष की पूजा के माध्यम से यह पर्व जल, जंगल और जमीन के प्रति आभार प्रकट करता है. उरांव, मुंडा और हो जनजाति इसे पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाती हैं. 21 मार्च यानि शनिवार को विशाल शोभा यात्रा निकलेगी. विभिन्न आदिवासी संगठनों ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को सरहुल शोभायात्रा में शामिल होने का न्योता भी दिया है.

प्रकृति के प्रति आभार
सरहुल प्रकृति के प्रति आभार प्रकट करने का अवसर है, जिसमें धरती माता, जंगल, जल, हवा और जीव-जंतुओं के प्रति सम्मान व्यक्त किया जाता है. यह पर्व सामाजिक एकता और भाईचारे का प्रतीक है, जहां लोग एक साथ मिलकर पूजा करते हैं और सामाजिक संबंध मजबूत करते हैं.
पर्यावरण के संरक्षण का संदेश
सरहुल हमें पर्यावरण संरक्षण का संदेश देता है, जो आज के दौर में बहुत प्रासंगिक इससे पहले पाहन साल वृक्ष की पूजा करेंगे. अच्छी फसल, वर्षा, स्वास्थ्य और समृद्धि की प्रार्थना करेंगे. पारंपरिक नृत्य और गीत के अद्भूत संगम के लोग नृत्य करते नजर आएंगे. सरहुल पर्व के अवसर पर आदिवासी समुदाय के लोग शुक्रवार को उपवास में रहे. इस दौरान नदी-तालाबों से मछली और केकड़ा भी पकड़े गए. शनिवार को सुबह 8 बजे बारिश होने की सूचना दी जाएगी. इसके अलावा, पांच मुर्गों की बली भी दी जाएगी.
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