Ravi Bharti
Ranchi: झारखंड की धरती पर इन दिनों सिर्फ मानसून नहीं बरस रहा, बल्कि आसमानी मौत भी बरस रही है. राज्य के खेत-खलिहानों से लेकर पहाड़ों की चोटियों तक, ठनका (वज्रपात) मासूम जिंदगियों को लील रहा है. चौंकाने वाली बात यह है कि जहां एक ओर आसमानी बिजली की तीव्रता 1.3 बिलियन वोल्ट तक पहुंच गई है, वहीं दूसरी ओर राज्य का आपदा प्रबंधन तंत्र कोमा में नजर आता है. सरकारी फाइलों में बनी योजनाएं धरातल पर उतरने से पहले ही दम तोड़ रही हैं, जिसका नतीजा यह है कि पिछले पांच वर्षों में झारखंड ने अपनों की सैकड़ों अर्थियां उठाई हैं. झारखंड में वज्रपात अब केवल एक प्राकृतिक घटना नहीं, बल्कि एक साइलेंट किलर बन चुका है.

पांच सालों में 1450 का आंकड़ा पार
• 2025-26 (मई 2026 तक): 200 से अधिक लोग काल के गाल में समा चुके हैं. अकेले 11 मई 2026 को राज्य के अलग-अलग हिस्सों में 6 लोगों की मौत ने सिस्टम की कलई खोल दी.
• 2024-25: इस कालखंड में 350 लोगों की जान गई. पिछले मानसून सीजन के दौरान सितंबर तक ही 186 मौतें दर्ज हो चुकी थीं.
• 2023-24: राज्य में औसतन 300 लोगों ने अपनी जान गंवाई.
• 2022-23: ग्रामीण क्षेत्रों में तबाही का मंजर रहा, जहां 320 लोग वज्रपात का शिकार हुए.
• 2021-22: मानसून की शुरुआत के साथ ही बिजली गिरने की घटनाओं में तेजी आई और 280 मौतें दर्ज हुईं.
थंडरिंग जोन: पांच जिले डेंजर जोन में
मौसम वैज्ञानिकों और आपदा विभाग के विश्लेषण के अनुसार, झारखंड के पांच जिले डेंजर जोन’ में हैं. हजारीबाग, रांची, खूंटी, सिमडेगा और पश्चिमी सिंहभूम को थंडरिंग जोन की पहली श्रेणी में रखा गया है. यहां बिजली गिरने की तीव्रता इतनी अधिक है कि सुरक्षित ठिकानों के अभाव में जान बचना नामुमकिन हो जाता है. विशेष रूप से दक्षिणी और पूर्वी झारखंड के क्षेत्रों में क्लाउड टू ग्राउंड बिजली का कहर सबसे अधिक देखा जा रहा है.
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तड़ित रोधक यंत्र सिर्फ देवघर और नामकुम तक सीमित
हैरानी की बात यह है कि सरकार ने ठनका से बचाव के लिए ऊंचे दावों वाली योजनाएं तो बनाईं, लेकिन वे धरातल पर नगण्य साबित हुईं. पूरे राज्य में अब तक केवल देवघर में छह और रांची के नामकुम में मात्र एक तड़ित रोधक यंत्र लगाया जा सका है. ऐतिहासिक पहाड़ी मंदिर और जगन्नाथपुर मंदिर जैसे संवेदनशील स्थानों पर भी सुरक्षा यंत्र लगाने की योजना अब तक कागजों से बाहर नहीं निकल पाई है. पुराने तड़ित चालकों की विफलता के बाद नए ‘तड़ित रोधक’ की बात कही गई थी, जो बिजली बनने से पहले ही उसे नष्ट करने (एम्मी मीटर तकनीक) की क्षमता रखते हैं. लेकिन 1.5 से 2 लाख रुपये की लागत वाली यह तकनीक बजट और इच्छाशक्ति की कमी के कारण आम जनता तक नहीं पहुंच पाई.
2016 के बाद से नहीं हुई आपदा प्रबंधन की बैठक
झारखंड में आपदा प्रबंधन की स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकार की 2016 के बाद से एक भी औपचारिक बैठक नहीं हुई है. जिला स्तर पर नियुक्त किए गए आपदा प्रबंधन पदाधिकारियों का अनुबंध रिन्यू नहीं होने के कारण आज जिले बिना किसी विशेषज्ञ नेतृत्व के काम कर रहे हैं.
इलेक्ट्रिक फील्ड मिल और पायलट प्रोजेक्ट
लगातार हो रही मौतों के बाद अब राज्य आपदा प्रबंधन विभाग ने अत्याधुनिक तकनीक इलेक्ट्रिक फील्ड मिल का सहारा लेने की योजना बनाई है. विभाग का दावा है कि यह सिस्टम 100 फीसदी सटीकता के साथ काम करेगा. यह उपकरण वज्रपात होने से 30 मिनट से 2 घंटे पहले ही अलर्ट जारी कर देगा. एक डिवाइस 4 किलोमीटर के रेडियस को कवर करेगी. पहले चरण में रांची, गुमला, बोकारो, पलामू और पश्चिमी सिंहभूम जैसे संवेदनशील जिलों का चयन किया गया है.
