Ranchi : झारखंड हाईकोर्ट ने आपराधिक मामलों की सुनवाई को लेकर कानूनी स्थिति स्पष्ट की है. अदालत ने कहा है कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 216 के तहत आरोपों में संशोधन करने या नए आरोप जोड़ने का विशेष अधिकार सिर्फ ट्रायल कोर्ट के पास है. अगर अभियोजन पक्ष या आरोपी किसी आवेदन के माध्यम से अदालत का ध्यान इस ओर आकर्षित करता है, तो मात्र इस आधार पर अदालत की इस स्वतः संज्ञान लेने की शक्ति को सीमित नहीं किया जा सकता है. झारखंड हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की एकल पीठ ने यह फैसला गढ़वा के एडिशनल सेशन जज के आदेश के खिलाफ दायर एक आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को खारिज करते हुए सुनाया है. निचली अदालत ने अभियोजन पक्ष की अर्जी को स्वीकार करते हुए मामले में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 328 (जहर देना) और 302/34 (हत्या) के अतिरिक्त आरोप तय किए थे. जिसे याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी.
पुलिस की चार्जशीट के तहत तय हुआ आरोप
यह मामला सविता देवी नामक महिला की संदिग्ध मौत से जुड़ा है. अभियोजन पक्ष के मुताबिक विवाह के बाद से ही ससुराल वालों द्वारा महिला को प्रताड़ित किया जा रहा था. आरोपों के मुताबिक ससुराल पक्ष ने महिला को जबरन सत्तू में जहर मिलाकर पिला दिया. जिससे उसकी मौत हो गई. घटना के बाद प्राथमिकी तो धारा 328 और 302/34 के तहत दर्ज की गई थी, लेकिन पुलिस ने जांच के बाद अदालत में सिर्फ धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) के तहत ही चार्जशीट दाखिल किया. जिसके बाद वर्ष 2017 में ट्रायल कोर्ट ने भी इसी धारा के तहत आरोप तय कर दिए. हालांकि केस के ट्रायल के दौरान जब गवाहों के बयान और साक्ष्य सामने आए तो अभियोजन पक्ष ने धारा 216 के तहत आवेदन देकर हत्या और जहर देने की धाराएं जोड़ने की मांग की. ट्रायल कोर्ट ने रिकॉर्ड पर आए साक्ष्यों को देखते हुए इस अर्जी को स्वीकार कर लिया था.

FSL की रिपोर्ट में हुआ खुलासा
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि धारा 216 किसी भी पक्ष को आरोप बदलने की मांग करने का अधिकार नहीं देती इसलिए कोर्ट को अभियोजन की अर्जी पर विचार ही नहीं करना चाहिए था. हाईकोर्ट ने इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि धारा 216 के तहत ट्रायल कोर्ट फैसला सुनाए जाने से पहले किसी भी समय आरोपों में बदलाव कर सकता है. बशर्ते रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्य इसकी पुष्टि करते हो. भले ही किसी पक्ष को धारा 216 के प्रयोग की मांग करने का कोई निहित अधिकार प्राप्त नहीं है लेकिन अगर कोई आवेदन देकर अदालत का ध्यान तथ्यों की ओर खींचता है तो इससे कोर्ट का अधिकार खत्म नहीं होता. हाईकोर्ट ने मामले के रिकॉर्ड देखकर यह पाया कि FIR और प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों में जहर देने की बात साफ थी. इसके अलावा FSL की रिपोर्ट ने भी मृतका के शरीर में अत्यधिक विषैले पदार्थ की मौजूदगी की पुष्टि की थी.
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