Hazaribagh : जिस आदिवासी पैर ने छह महीने पहले जर्मनी की पिच पर विदेशी डिफेंडरों को छकाकर मैन ऑफ द मैच की ट्रॉफी जीती थी. आज वहीं पैर हजारीबाग के एक सुदूर गांव में फटे बूट के साथ खेतों की कीचड़ नापने को मजबूर हैं. गरीबी और सिस्टम का क्रूर मजाक देखिए- 18 साल का जो जांबाज फुटबॉलर यूरोप के मैदानों पर देश का सीना चौड़ा कर लौटा था, आज वह दाने-दाने को मोहताज होकर फुटबॉल को हमेशा के लिए अलविदा कहने की कगार पर है. टाटीझरिया के सिमराढाब का यह कड़वा सच हमारी खेल नीति और दावों के मुंह पर एक करारा तमाचा है. आर्थिक तंगी की ऐसी मार पड़ी कि होनहार फुटबॉलर अमित सोरेन के पैर मैदान के बजाय खेतों की ओर मुड़ रहे हैं. 18 वर्षीय अमित सोरेन की आंखों में सन्नाटा और उदासी है. अमित को अब लगने लगा है कि गरीब का बेटा ऊंचे सपने नहीं देख सकता और उसकी दुनिया अब गांव, खेती-किसानी और मजदूरी तक ही सिमट कर रह जाएगी.
कपड़े की गेंद से शुरू हुआ था जर्मनी तक का सफर
अमित ने बताया कि बचपन से ही उसे फुटबॉल का जुनून था. साधन नहीं थे, तो वह कपड़े की गेंद बनाकर गांव के मैदान में दिन-भर दौड़ता था. सरकारी स्कूलों के टूर्नामेंट में जब उसने खेलना शुरू किया, तो उसकी रफ्तार देखकर लोग दांतों तले उंगली दबा लेते थे. पंचायत, प्रखंड से होते हुए अमित जिला स्तर पर संत राबर्ट हाई स्कूल के मैदान में खेलने पहुंचा. वहां ट्रायल में एक बार असफलता हाथ लगी, लेकिन अमित ने हार नहीं मानी. बेहतर कोच की तलाश में वह किसी तरह कोलकाता की बंगाली फुटबॉल एकेडमी पहुंचा. वहां के कोच दिगा यातानु ने अमित की प्रतिभा को पहचाना और उसे निखारना शुरू किया. एकेडमी की ओर से अमित ने 11 राज्य स्तरीय मैच खेले और शानदार प्रदर्शन किया.

जर्मनी में बजाया डंका, पर खाली रह गए हाथ
अमित की प्रतिभा का ही कमाल था कि एकेडमी उसे जनवरी-फरवरी 2026 में जर्मनी दौरे पर ले गई. वहां आयोजित 11 प्रतियोगिताओं में से अमित की टीम ने 8 में ऐतिहासिक जीत दर्ज की. जर्मनी के खिलाफ मैच में अमित ने ऐसा उम्दा खेल दिखाया कि उसे वहां मैन ऑफ द मैच के खिताब से नवाजा गया. लेकिन इस कामयाबी के बाद जब वह भारत लौटा, तो आगे के खर्च और एकेडमी की फीस के लिए पैसे नहीं थे.
मजदूर पिता और अभावों के बीच पल रहा परिवार
अमित वर्तमान में 12वीं का छात्र है. उसने अपनी प्राथमिक शिक्षा गांव के स्कूल से और मैट्रिक खैरा-करमा उच्च विद्यालय से पूरी की. अमित के पिता टेकलाल सोरेन मजदूरी करके किसी तरह परिवार का पेट पालते हैं, जबकि मां रानी देवी गृहिणी हैं. दो बहनें प्रीति और प्रियंका भी पढ़ाई कर रही हैं. ऐसे में पूरे परिवार का खर्च चलाना ही जहां चुनौती हो, वहां फुटबॉल के महंगे बूट और किट का खर्च उठाना नामुमकिन साबित हो रहा है.
सिस्टम और समाज से एक सवाल
अमित के पैरों में आज भी वही रफ्तार है और सीने में फुटबॉल के प्रति वही आग. लेकिन सवाल यह है कि क्या हमारी खेल नीतियां और सरकार इस अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतिभा को बूट टांगने से रोक पाएंगी. सिमराढाब के ग्रामीणों को उम्मीद है कि सरकार या कोई मददगार संस्था अमित का हाथ थामेगी, ताकि देश का यह लाल एक बार फिर मैदान पर उतरकर तिरंगा लहरा सके.
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