Ranchi: शुक्रवार यानी आज प्रोजेक्ट भवन वो देखने को मिला जो शायद ही कभी देखने को मिलता है. राज्य सरकार के हालिया कैबिनेट निर्णय ने सचिवालय सेवा के अधिकारियों में गहरी नाराजगी पैदा कर दी है, जिसके चलते प्रोजेक्ट भवन परिसर में विरोध के स्वर मुखर हो गए हैं. अधिकारियों ने कार्मिक विभाग के शीर्ष नेतृत्व के निर्णयों को चुनौती देते हुए अपनी सेवा शर्तों में किए गए बदलाव को अन्यायपूर्ण करार दिया है. इसी मामले में शुक्रवार की सुबह सचिवालय संघ के सदस्य पहले सीएम आवास पहुंचे. लेकिन सीएम हेमंत सोरेन से उनकी व्यस्तता की वजह से मुलाकात नहीं हो पायी. दोपहर को संघ के सदस्य प्रोजेक्ट भवन पहुंचे. वहां उन्होंने कार्मिक सचिव के कार्यालय का घेराव किया और नारेबादी की. संघ के सदस्यों की तरफ से कार्मिक सचिव हाय-हाय और Go Back के नारे लगे. आपको बता दें कि कार्मिक सचिव के कार्यालय के पास ही मुख्य सचिव और गृह सचिव का कार्यालय भी है.

प्रदर्शन और आंदोलन की चेतावनी
प्रोजेक्ट भवन में हुए विरोध-प्रदर्शन के दौरान अधिकारियों ने दादागीरी नहीं चलेगी जैसे नारे लगाकर अपनी नाराजगी दर्ज कराई. उन्होंने स्पष्ट किया कि यह केवल प्रोन्नति का मुद्दा नहीं है, बल्कि उनकी कार्यक्षमता और प्रशासनिक गरिमा से जुड़ा प्रश्न है. अधिकारियों ने सरकार से मांग की है कि कैबिनेट के इस फैसले पर तत्काल पुनर्विचार किया जाए और पुरानी व्यवस्था को बहाल किया जाए. साथ ही, उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने उनकी तार्किक आपत्तियों को दरकिनार किया और मांगों पर गंभीरता से विचार नहीं किया, तो आने वाले दिनों में आंदोलन का स्वरूप और अधिक आक्रामक हो सकता है. फिलहाल, राज्य सरकार की ओर से इस मामले में कोई ठोस प्रतिक्रिया नहीं आई है.
विवाद की जड़, संकल्प में संशोधन और प्रोन्नति का गणित
इस पूरे विवाद की धुरी कार्मिक विभाग का संकल्प संख्या-3286 है. पूर्व में इस संकल्प के तहत राज्य के विभिन्न सेवाओं के कर्मियों और अधिकारियों की प्रोन्नति के लिए एक निश्चित समय-सीमा तय की गई थी. सचिवालय सेवा के अधिकारियों ने इसी संकल्प का हवाला देते हुए झारखंड हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. अदालत ने भी मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए कार्मिक विभाग को संकल्प के अनुरूप प्रोन्नति सुनिश्चित करने के निर्देश दिए थे. लेकिन, 9 जुलाई को होने वाली अगली सुनवाई से ठीक पहले, राज्य सरकार ने कैबिनेट के माध्यम से संकल्प में ही संशोधन कर दिया. इस संशोधन के जरिए सचिवालय सेवा को उस दायरे से बाहर कर दिया गया, जिसके तहत उन्हें लाभ मिलने की उम्मीद थी. नतीजतन, अधिकारियों के लिए प्रोन्नति की अवधि 8 वर्ष से बढ़कर सीधे 16 वर्ष हो गई है. यानी, अब एक सचिवालय अधिकारी को पदोन्नति पाने के लिए दोगुना इंतजार करना होगा.

भेदभाव और करियर पर संकट का तर्क
सचिवालय सेवा संघ का तर्क है कि सरकार का यह कदम न केवल विरोधाभासी है, बल्कि भेदभावपूर्ण भी है. संघ के पदाधिकारियों का कहना है कि प्रशासनिक पदानुक्रम में सचिवालय सेवा के अधिकारियों के साथ यह रवैया उनके करियर के विकास को अवरुद्ध करेगा. उनका मुख्य तर्क यह है कि इस नए नियम के लागू होने के बाद, उनसे कम ग्रेड पे वाले अन्य विभागों के कर्मी या अधिकारी उनसे पहले प्रोन्नति प्राप्त कर लेंगे, जबकि मूल रूप से उच्च पद या समान स्तर पर काम करने वाले सचिवालय अधिकारियों को दोगुने समय तक प्रतीक्षा करनी होगी. संघ के अनुसार, यह ‘समान काम के लिए समान अवसर’ के सिद्धांत के विरुद्ध है और इससे कार्यबल का मनोबल गिरेगा.


