Ravi Bharti
Ranchi: पंद्रह दिनों तक एकांतवास के मौन में डूबा समूचा जगन्नाथपुर मंगलवार को एक बार फिर जय जगन्नाथ के उद्घोष से गुंजायमान हो उठा. 15 दिनों के अनवसर काल की समाप्ति के बाद, प्रभु जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा ने जैसे ही अपने भक्तों को दर्शन दिए, मानो भक्तों के सूने नयनों में भी प्राण लौट आए. यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भक्त और भगवान के उस अटूट मिलन की पराकाष्ठा है, जिसका साक्षी बनने के लिए पूरा शहर उमड़ पड़ा. आज का दिन केवल एक तिथि नहीं, बल्कि आस्था का वह ज्वार है जहां ईश्वर और भक्त के बीच की दूरी मिट जाती है.
15 दिनों के विरह का अंत, नेत्रदान की अद्भुत छटा
वैदिक मंत्रोच्चार और शंखध्वनि के बीच, जब मंदिर के गर्भगृह के कपाट खुले, तो वातावरण में एक दिव्य ऊर्जा का संचार हो गया. 15 दिनों के अनवसर के बाद जब प्रभु की प्रतिमाओं में नेत्रदान की रस्म पूरी की गई, तो ऐसा प्रतीत हुआ मानो साक्षात जगत के नाथ अपनी करुणा भरी दृष्टि से अपने भक्तों को निहार रहे हों. मुख्य पुरोहित के सानिध्य में संपन्न हुए इस अनुष्ठान ने भक्तों की आंखों में श्रद्धा के आंसू ला दिए. नेत्रदान के बाद प्रभु की प्रथम झलक पाकर श्रद्धालु धन्य हो गए. मंदिर परिसर में 108 दीपों से की गई भव्य महाआरती ने अंधकार को मिटाकर प्रकाश के उस मार्ग को प्रशस्त किया, जो सीधे ईश्वर के चरणों तक जाता है. भगवान को समर्पित विशेष भोग—जिसमें मालपुआ, इलायची दाना, बादाम और ऋतुफल शामिल थे, इस बात का प्रतीक है कि प्रभु अपने भक्तों के प्रेम के भूखे हैं.

यह भी पढ़ें: एक्शन में सीएम हेमंत सोरेन : प्रोजेक्ट्स में देरी की तो नपेंगे अधिकारी, समय सीमा और गुणवत्ता से समझौता नामंजूर
आस्था का वह सफर, जो मोक्ष का द्वार है
गुरुवार का दिन इतिहास के पन्नों में एक बार फिर दर्ज होने जा रहा है. सुबह की विशेष पूजा-अर्चना के साथ शुरू होने वाला यह दिन दोपहर होते-होते उस महायात्रा में बदल जाएगा, जिसे देखने के लिए देव भी तरसते हैं. प्रभु जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा अपने भव्य रथों पर विराजमान होकर अपनी मौसी के घर (मौसीबाड़ी) की ओर प्रस्थान करेंगे. रथ को खींचने का अर्थ केवल लकड़ी की संरचना को गति देना नहीं है, बल्कि यह अपने अहंकार और पापों को त्यागकर ईश्वर के मार्ग पर चलने का प्रतीक है. कहा जाता है कि जो भक्त रथ की डोरी को स्पर्श करता है, उसके जन्मों के बंधन कट जाते हैं. नौ दिनों तक मौसीबाड़ी में रहने के बाद भगवान पुनः अपने मूल मंदिर में लौटेंगे, लेकिन इस दौरान होने वाली भक्ति की बयार पूरे वातावरण को पवित्र कर देगी.
विष्णु सहस्त्रनाम का दिव्य स्वर
इस वर्ष की रथयात्रा में एक अलौकिक दृश्य देखने को मिलेगा. शाम 5 बजे जब रथयात्रा का शुभारंभ होगा, तब 501 दंपतियों द्वारा सामूहिक रूप से विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ किया जाएगा. मंदिर की प्राचीर से गूंजते इन मंत्रों की अनुगूंज संपूर्ण जगन्नाथपुर को एक तपोवन में बदल देगी. यह सामूहिक पाठ न केवल शांति और समृद्धि का संदेश देगा, बल्कि यह दर्शाएगा कि प्रभु के दरबार में हर कोई समान है.

सज गया है प्रभु का धाम, उमड़ा जनसैलाब
रथयात्रा की तैयारी को लेकर मंदिर परिसर किसी दुल्हन की तरह सजा हुआ है. आकर्षक अलंकरण, रंग-बिरंगी पताकाएं और विद्युत सज्जा ने पूरे मंदिर को एक दिव्य लोक का स्वरूप दे दिया है. मंदिर के बाहर मेला क्षेत्र में भी रौनक अपने चरम पर है. पूजा सामग्री, खिलौने और पारंपरिक मिठाइयों की दुकानों पर भक्तों की भीड़ देखी जा सकती है.
सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम
सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं ताकि लाखों की संख्या में पहुंचने वाले श्रद्धालु बिना किसी बाधा के प्रभु का दर्शन कर सकें. प्रशासन और मंदिर समिति ने मिलकर हर संभव प्रयास किया है कि सुदूर क्षेत्रों से आने वाले श्रद्धालुओं को कोई कष्ट न हो. जगन्नाथपुर मंदिर के मुख्य पुरोहित के अनुसार, भगवान जगन्नाथ के दर्शन मात्र से ही जीवन के सारे संताप दूर हो जाते हैं. यह रथयात्रा केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि धर्म और संस्कृति का वह सेतु है जो हमें हमारे मूल्यों से जोड़ता है.
