सरायकेला: स्वर्णरेखा तट पर स्थित प्राचीन जयदा शिव मंदिर आस्था का प्रमुख केंद्र, शादी-विवाह से लेकर रुद्राभिषेक तक हर महीने उमड़ता है भक्तों का जनसैलाब

Saraikela: चांडिल अनुमंडल क्षेत्र में स्वर्णरेखा नदी के तट पर स्थित प्राचीनकालीन जयदा शिव मंदिर आस्था और विश्वास का प्रमुख केंद्र बना...

जयदा शिव मंदिर में हर मन्नत होती है पूरी, सावन में पातालेश्वर धाम तक निकलती है हजारों कांवरियों की आस्था यात्रा
जयदा शिव मंदिर में हर मन्नत होती है पूरी, सावन में पातालेश्वर धाम तक निकलती है हजारों कांवरियों की आस्था यात्रा

Saraikela: चांडिल अनुमंडल क्षेत्र में स्वर्णरेखा नदी के तट पर स्थित प्राचीनकालीन जयदा शिव मंदिर आस्था और विश्वास का प्रमुख केंद्र बना हुआ है. मान्यता है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई हर मन्नत पूरी होती है. इसी कारण झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और बिहार के कोने-कोने से भक्त यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं.

मंदिर परिसर में होती है विधि-विधान से शादी

जयदा शिव मंदिर की एक खास पहचान यह भी है कि यहां पूरे साल शादी-विवाह का आयोजन किया जाता है. मंदिर के महंत केशवानंद सरस्वती ने बताया कि शादी के इच्छुक दोनों पक्षों का आधार कार्ड और पहचान पत्र लिया जाता है. इसके बाद मंदिर के पुजारी द्वारा वैदिक मंत्रोच्चार और पूरी हिंदू रीति-रिवाज के साथ विवाह संपन्न कराया जाता है. महंत ने कहा कि दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं की सुविधा को ध्यान में रखते हुए यहां शादी की सभी व्यवस्था मंदिर प्रबंधन द्वारा उपलब्ध कराई जाती है. कम खर्च में पवित्र स्थान पर विवाह होने के कारण हर वर्ग के लोग यहां शादी करना पसंद करते हैं.

रुद्राभिषेक और नित्य पूजा

मंदिर में प्रतिदिन रुद्राभिषेक और विशेष पूजा-अर्चना की जाती है. भक्त अपनी मनोकामना लेकर जल, बेलपत्र और दूध अर्पित करते हैं. महंत के अनुसार बाबा की कृपा से सभी भक्तों की मन्नतें पूरी होती हैं, जिस कारण बारहों महीने यहां भक्तों का जनसैलाब उमड़ता रहता है.

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सावन में विशेष महत्व, निकलती है कांवर यात्रा

सावन माह में जयदा शिव मंदिर का महत्व और बढ़ जाता है. पवित्र श्रावण मास में बड़ी संख्या में बोल-बम कांवरिया स्वर्णरेखा नदी से पवित्र जल भरकर यात्रा पर निकलते हैं. श्रावणी मेले के दौरान कांवरिया यहां पूजा-अर्चना के बाद स्वर्णरेखा का जल लेकर पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले में स्थित बाबा पातालेश्वर शिव धाम के लिए प्रस्थान करते हैं. यह प्राचीन मंदिर टाटा-पुरुलिया एनएच-18 मुख्य राज्य मार्ग पर विराजमान है. मान्यता है कि यहां जल चढ़ाने से मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है.

दलमा बूढ़ा बाबा का भी है महत्व

सावन के महीने में श्रद्धालु दलमा सेंचुरी की चोटी पर स्थित प्राचीनकालीन दलमा बूढ़ा बाबा मंदिर में भी बड़ी संख्या में पहुंचते हैं. कहा जाता है कि दलमा बूढ़ा बाबा क्षेत्र के रक्षक हैं. सावन में दूर-दराज से शिवभक्त यहां जलाभिषेक और पूजा करने आते हैं. महंत केशवानंद सरस्वती ने बताया कि जयदा शिव मंदिर क्षेत्र की धार्मिक विरासत का प्रतीक है. यहां हर जाति और समुदाय के लोग आकर शांति और आशीर्वाद पाते हैं.

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