Ranchi: प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण को देश के हर गरीब और बेघर परिवार को पक्की छत मुहैया कराने के सपने के साथ शुरू किया गया था. मकसद साफ था कि झोपड़ियों और जीर्ण-शीर्ण कच्चे मकानों में जिंदगी गुजारने वाले लोगों को मूलभूत सुविधाओं से लैस पक्के मकान मिल सकें. मंगलवार को विधानसभा में पेश की गई कैग की रिपोर्ट के अनुसार, इस योजना में 2.90 लाख अपात्रों की एंट्री हो गई. 6.32 लाख योग्य परिवार बाहर हो गए. केंद्र का हिस्सा ट्रांसफर करने में देरी के कारण राज्य सरकार पर 22.39 करोड़ रुपये का जुर्माना लगा. शुरुआती पायलट प्रोजेक्ट के बाद साल 2022 से 2024 के बीच कोई सोशल ऑडिट नहीं किया गया.
अपात्रों की मौज और अपनों का खेल
योजना की शुरुआत से ही पारदर्शिता की धज्जियां उड़ाई गईं. कैग की रिपोर्ट के मुताबिक, सामाजिक आर्थिक जाति जनगणना की प्राथमिकता सूची और स्थायी प्रतीक्षा सूची को ग्राम सभाओं तथा जिला अपीलीय समितियों द्वारा न तो ठीक से सत्यापित किया गया और न ही सही तरीके से अंतिम रूप दिया गया. नतीजा यह हुआ कि करीब 2.90 लाख अपात्र लोग इस सूची में घुसपैठ करने में सफल रहे, जिन्हें बाद में साल 2017-18 से 2023-24 के दौरान प्रशासनिक कार्रवाई के तहत हटाना पड़ा. सबसे हैरान करने वाली बात तो यह है कि जांच के दौरान छह जिलों की 60 ग्राम पंचायतों में से एक भी पंचायत ऐसी नहीं मिली, जो 2016 से 2024 के बीच अंतिम और निर्णायक प्रतीक्षा सूची से जुड़े कोई दस्तावेज या अभिलेख पेश कर सके.
6.32 लाख गरीब परिवार हुए योजना से बाहर
राज्य सरकार ने नवंबर 2022 तक कुल 22.34 लाख योग्य परिवारों की पहचान की थी. लेकिन सूचियों में भारी-भरकम गड़बड़ियों, लक्ष्यों का सही इस्तेमाल न कर पाने की लाचारी और लाभार्थियों को अंतिम रूप देने में पूरे दो साल का लंबा विलंब कर दिया गया. इस प्रशासनिक नाकामी का खामियाजा गरीब जनता को भुगतना पड़ा. भारत सरकार ने सिर्फ 16.02 लाख आवासों का ही आवंटन किया, जिसके चलते 6.32 लाख योग्य परिवार यानी 28 प्रतिशत जरूरतमंद इस योजना के दायरे से पूरी तरह बाहर हो गए. जिन गिने-चुने लोगों को मंजूरी मिली भी, उनमें से कई को जमीन के विवाद और सत्यापन की कमी के चलते दर-दर भटकना पड़ा.
न समय पर काम, न गुणवत्ता का ख्याल
सैंपल वाले जिलों में 2019 से 2024 के बीच कोई वार्षिक कार्य योजना ही तैयार नहीं की गई. जिन आवासों को महज 12 महीने के भीतर पूरा हो जाना चाहिए था, उन्हें तैयार होने में एक साल से लेकर तीन साल से भी ज्यादा का वक्त लग गया. हद तो तब हो गई, जब उन मकानों के लिए भी अगली किस्तें जारी कर दी गईं, जिन्हें खुद अधिकारियों ने ‘निर्माण नहीं किया जाना है’ की श्रेणी में वर्गीकृत किया था. पूर्वी सिंहभूम और रांची को छोड़कर किसी भी जिले में यह दिखाने के लिए डेमो आवास नहीं बनाए गए कि कम लागत में बेहतर और सुंदर मकान कैसे बन सकता है. क्षेत्रीय आवास शैली और हरित प्रौद्योगिकियों को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया.
शौचालय विहीन घर और बुनियादी सुविधाओं का मजाक
झारखंड को दिसंबर 2018 में ही खुले में शौच मुक्त घोषित कर दिया गया था, लेकिन सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच का फर्क इस रिपोर्ट ने बेनकाब कर दिया है. लेखापरीक्षा के दौरान यह पाया गया कि कवर किए गए 48 प्रतिशत आवासों में शौचालय की सुविधा थी ही नहीं. वहीं, राज्य पीएमयू की अप्रैल 2024 की रिपोर्ट के अनुसार भी पूर्ण हो चुके कुल आवासों में से आठ प्रतिशत घरों में शौचालय नदारद था. इसके अलावा बिजली, पीने का पानी और अन्य बुनियादी सहूलियतें देने के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति की गई.
सरकारी खजाने को करोड़ों का चूना
गरीबों के कल्याण के लिए आने वाले फंड का प्रबंधन भी बेहद निराशाजनक रहा. केंद्र सरकार के हिस्से की राशि को समय पर स्टेट नोडल एजेंसी तक ट्रांसफर करने में 3 से 92 दिनों तक की भारी देरी की गई. इसका नतीजा यह हुआ कि राज्य सरकार पर 22.39 करोड़ रुपये का दंडात्मक ब्याज थोप दिया गया. राज्य का अपना हिस्सा ट्रांसफर करने में भी 8 से 79 दिनों की देरी हुई. साल 2019-24 के दौरान उपलब्ध प्रशासनिक निधि 503.75 करोड़ रुपये थी, जिसमें से महज 202.91 करोड़ यानी केवल 40 प्रतिशत राशि ही खर्च हो पाई. पैसा इसलिए खर्च नहीं हुआ, क्योंकि न तो लाभार्थियों को तकनीकी सहायता दी गई और न ही राजमिस्त्रियों के प्रशिक्षण पर ध्यान दिया गया.
निगरानी तंत्र फेल
साल 2020-21 के दौरान कुछ चुनिंदा जिलों की 77 पंचायतों में पायलट आधार पर सामाजिक लेखापरीक्षा कराई गई थी. लेकिन इसके बाद 2022 से 2024 के बीच राज्य में कहीं भी कोई सोशल ऑडिट नहीं हुआ. यही वजह है कि घपले और कमियां वक्त रहते पकड़ में नहीं आ सकीं. जिला, प्रखंड और राज्य स्तर पर न तो कोई प्रभावी निगरानी समिति सक्रिय थी और न ही जनता की शिकायतों को सुनने के लिए कोई पुख्ता मंच काम कर रहा था. ग्राम पंचायतों ने भी अपनी निगरानी गतिविधियों का कोई रिकॉर्ड तक मेंटेन नहीं किया.
कैग की सख्त सिफारिशें
- भविष्य में लाभार्थियों का चयन करते समय नियमों और दिशा-निर्देशों का पूरी सख्ती से पालन किया जाए.
- छूटे हुए सभी पात्र ‘आवास प्लस’ लाभार्थियों को प्राथमिकता के आधार पर पक्के मकान दिए जाएं.
- जमीन के मालिकाना हक के सत्यापन के लिए एक ठोस मानक संचालन प्रक्रिया तुरंत लागू की जाए.
- निर्माण नहीं किए जाने वाले’ मकानों के नाम पर अवैध रूप से किस्तें जारी करने वाले भ्रष्ट और लापरवाह अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई हो.
- पूर्ण हो चुके सभी आवासों में अभिसरण के जरिए बिजली, पानी और शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाएं सुनिश्चित की जाएं.
- प्रशासनिक फंड के दुरुपयोग को रोका जाए और राज्य, जिला तथा प्रखंड स्तर पर मजबूत निगरानी व शिकायत निवारण तंत्र स्थापित किया जाए.
