RANCHI: निजी स्कूलों की मनमानी पर लगाम कसने के लिए हुई बैठकें, डीसी मंजूनाथ भजंत्री की सख्ती और बड़े-बड़े फैसले सब कुछ कागजी घोड़ा साबित हो रहा है. री-एडमिशन फीस के नाम पर हो रही खुली लूट को रोकने के लिए प्रशासन ने बैठकें कीं, स्कूल मैनेजमेंट को बुलाया और साफ-साफ निर्देश दिए. लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है. स्कूल अपनी मनमानी चला रहे हैं. फीस नहीं घटी, बल्कि नए-नए तरीकों से पैसे वसूले जा रहे हैं. अभिभावक निराश हैं और कह रहे हैं कि उन्हें सिर्फ धोखा दिया गया.
बैठक में क्या तय हुआ था
डीसी साहब की अध्यक्षता में हुई बैठक में तय हुआ था कि री-एडमिशन फीस पूरी तरह बंद होगी. बिना अनुमति 10% से ज्यादा फीस बढ़ोतरी नहीं होगी. किताबें स्कूल जबरन नहीं बेचेंगे और किसी खास दुकान से खरीदने का दबाव नहीं बनाएंगे. ड्रेस स्कूल नहीं बेचेंगे.
जानिए जमीनी सच्चाई क्या है ?
अभिभावकों को लगा कि अब बोझ हल्का होगा, खासकर री-एडमिशन फीस खत्म होने से खर्च कम होगा. लेकिन सच्चाई इसके ठीक उलट निकली. ज्यादातर स्कूलों में फीस में कोई कमी नहीं आई. री-एडमिशन के नाम पर जो रकम ली जाती थी, उसे अब एनुअल चार्ज, डेवलपमेंट फीस, मेंटेनेंस चार्ज, कंप्यूटर फीस या अन्य नामों से वसूला जा रहा है. कुछ स्कूलों ने लंपसम अमाउंट बढ़ा दिया, जिसे डीसी ने खुद “री-एडमिशन के बराबर” माना था.
अभिभावकों की शिकायत,बोझ और बढ़ा
एक अभिभावक ने बताया, “री-एडमिशन नहीं ले रहे, लेकिन एनुअल फीस में इतना इजाफा कर दिया कि पहले से ज्यादा बोझ पड़ रहा है. किताबें और ड्रेस भी स्कूल से ही खरीदने को मजबूर किया जा रहा है.” कई स्कूलों में 15-30% तक की बढ़ोतरी की शिकायतें आई हैं, जबकि नियम सिर्फ 10% की इजाजत देता हैवो भी कमिटी की मंजूरी के बिना नहीं.
नियम-कानून भी बेअसर
झारखंड एजुकेशन ट्रिब्यूनल (अमेंडमेंट) एक्ट-2017 के तहत फीस रेगुलेशन कमिटी बनाई गई थी. डीसी ने नोटिस जारी किए, स्कूलों से पिछले तीन सालों और चालू सत्र 2026-27 की क्लास-वार फीस स्ट्रक्चर मांगी. उल्लंघन पर 50 हजार से 2.5 लाख तक जुर्माना और गंभीर मामलों में मान्यता रद्द करने की चेतावनी भी दी गई. पैरेंट्स-टीचर्स एसोसिएशन और स्कूल-लेवल फीस कमिटी बनाने के निर्देश दिए गए. लेकिन स्कूल इन आदेशों को नजरअंदाज कर रहे हैं.
शिकायतें हुईं, कार्रवाई नहीं
झारखंड पैरेंट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष अजय राय समेत कई अभिभावक पहले ही मेमोरेंडम देकर शिकायत कर चुके हैं. फिर भी कार्रवाई नजर नहीं आ रही. कुछ स्कूलों को नोटिस जरूर भेजे गए, लेकिन जमीनी स्तर पर बदलाव शून्य है. अभिभावकों का आरोप है कि स्कूल मैनेजमेंट और प्रशासन के बीच एक अनजाना समझौता चल रहा है, जिसकी वजह से आदेश सिर्फ कागजों तक सीमित हैं.
मध्यम वर्ग पर दोहरी मार
रांची के मध्यम वर्गीय परिवारों पर यह दोहरी मार है. महंगाई के इस दौर में शिक्षा का खर्च पहले ही बोझ है, ऊपर से यह मनमानी. बच्चे पढ़ रहे हैं, लेकिन माता-पिता हर महीने नए-नए चार्जेस से जूझ रहे हैं.
बड़ा सवाल-एक्शन कब?
डीसी मंजूनाथ भजंत्री और जिला प्रशासन से अब सवाल यह है की क्या सिर्फ बैठकें और प्रेस रिलीज काफी हैं? या असली कार्रवाई, ऑडिट, रिफंड और सख्त सजा की जरूरत है? अगर स्कूल डीसी के आदेशों को ताक पर रख सकते हैं, तो अभिभावक किस उम्मीद से प्रशासन की तरफ देखें?
अभी तक न तो कोई बड़ा रिफंड हुआ, न किसी स्कूल पर भारी जुर्माना लगा, न मनमानी रुकी. सच यही है कि रांची के निजी स्कूल अभी भी वैसे ही चल रहे हैं जैसे वे चाहते हैं. अभिभावकों को बेवकूफ बनाया जा रहा है. बैठकें हुईं, फैसले हुए, लेकिन लूट जारी है.
