HAZARIBAGH: जिले की प्रशासनिक व्यवस्था इन दिनों गंभीर सवालों के घेरे में है. कई विभागों के अधिकारी पिछले 14 वर्षों से एक ही स्थान पर जमे हुए हैं, जबकि नियम स्पष्ट तौर पर कहते हैं कि किसी भी अधिकारी का एक ही स्थान पर कार्यकाल अधिकतम 3 वर्ष होना चाहिए. ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर किसके संरक्षण में ये अधिकारी और कर्मचारी वर्षों से अपनी कुर्सी बचाए हुए हैं.
कई विभागों में वर्षों से वही पुराने चेहरे
शिक्षा, स्वास्थ्य, खनन, पेयजल, वन, परिवहन, पशुपालन और यहां तक कि पुलिस विभाग के ड्राइवर और सिपाही—लगभग हर अहम विभाग में वही पुराने चेहरे वर्षों से काबिज हैं. सूत्रों के मुताबिक, कई अधिकारियों के तबादला आदेश जारी होने के बावजूद वे जिले को छोड़ने को तैयार नहीं होते.
चर्चाओं में “ऊपर तक पहुंच” और मजबूत सेटिंग का जिक्र आम हो चुका है, जिससे ट्रांसफर सिस्टम पर ही सवाल खड़े हो रहे हैं.
माफियाओं से बढ़ती नजदीकी के आरोप
स्थानीय लोगों का कहना है कि इतने लंबे समय तक एक ही जगह टिके रहने से कुछ अधिकारियों की पकड़ माफियाओं और स्थानीय नेटवर्क पर मजबूत हो गई है. कोयला, बालू और जमीन से जुड़े कारोबार में कथित संलिप्तता की बातें भी जोर पकड़ रही हैं. यही वजह है कि कई अधिकारी दूसरे जिले में जाने से बचते हैं, क्योंकि यहां उन्होंने अपनी जड़ें और ‘सिस्टम’ दोनों मजबूत कर लिए हैं.
घोटालों के बावजूद कार्रवाई पर सवाल
गौरतलब है कि हजारीबाग में बीते वर्षों में ट्रेजरी, पशुपालन और पेयजल विभाग से जुड़े घोटाले सामने आ चुके हैं. इसके बावजूद लंबे समय से जमे अधिकारियों पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं होना प्रशासनिक इच्छाशक्ति पर सवाल खड़े करता है.
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी अधिकारी का लंबे समय तक एक ही स्थान पर बने रहना निष्पक्षता को खत्म करता है और भ्रष्टाचार को जन्म देता है. हजारीबाग में भी यही तस्वीर उभरती दिख रही है, जहां “कुर्सी पर कब्जा” अब व्यवस्था पर भारी पड़ता नजर आ रहा है.
अब बड़ा सवाल प्रशासन के सामने
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रशासन इस ‘जमे रहो और खेल करो’ संस्कृति पर लगाम लगाएगा, या फिर सिस्टम की खामियों के सहारे कुछ अधिकारी यूं ही वर्षों तक जिले को अपनी ‘जागीर’ बनाए रखेंगे. जनता की नजर अब प्रशासनिक कार्रवाई पर टिकी है—क्या इस बार कुछ बदलेगा या फिर सब कुछ पहले जैसा ही चलता रहेगा.
