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हजारीबाग में बालू का काला खेल, बिहार के चालान पर झारखंड की नदियों में डकैती, ED की दबिश के बाद भी सिंडिकेट बेखौफ

Hazaribagh : नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल द्वारा मानसून के दौरान नदियों से बालू उत्खनन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाए जाने के बावजूद हजारीबाग और...

Hazaribagh : नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल द्वारा मानसून के दौरान नदियों से बालू उत्खनन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाए जाने के बावजूद हजारीबाग और बड़कागांव के इलाकों में बालू का अवैध धंधा थमने का नाम नहीं ले रहा है. प्रवर्तन निदेशालय की लगातार जारी दबिश और कड़े एक्शन के बावजूद बालू माफियाओं और खनन विभाग के भ्रष्ट अधिकारियों की मिलीभगत से यह सिंडिकेट बिना किसी डर के फल-फूल रहा है. हाल ही में पुलिस और खनन विभाग द्वारा जब्त किए गए अवैध बालू लदे हाईवा गाड़ियां इस संगठित लूट का महज एक छोटा सा सिरा हैं. इस पूरे खेल के पीछे बिहार से लेकर झारखंड के कई जिलों तक फैला एक बेहद शातिर और मजबूत नेटवर्क काम कर रहा है.

बिहार से हंटरगंज और बड़कागांव: ऐसे तय होता है ‘नजराने’ का सफर

सूत्रों के अनुसार, इस पूरे खेल की शुरुआत पड़ोसी राज्य बिहार से होती है. बिहार से 3 से 4 रुपये प्रति CFT की दर पर परिवहन चालान जारी कर बालू को चतरा के हंटरगंज स्थित स्टॉक यार्ड तक कागजों में पहुंचाया जाता है. इसके बाद जिला खनन कार्यालय के अधिकारियों को कथित तौर पर प्रति चालान 5 रुपये का गुप्त नजराना देकर उसी चालान को 14 रुपये प्रति CFT की दर से बड़कागांव स्टॉक यार्ड के नाम पर काट दिया जाता है. बताया जाता है कि यह पूरी प्रक्रिया केवल कागजों पर वैधता दिखाने के लिए की जाती है, जबकि वास्तविकता में बालू बड़कागांव क्षेत्र की नदियों से अवैध रूप से निकाली जाती है. सूत्रों का दावा है कि स्थानीय स्तर पर अधिकारियों को साधने के लिए प्रत्येक चालान पर 4 से 5 रुपये प्रति CFT का अतिरिक्त भुगतान भी किया जाता है, जिसके बदले अवैध खनन को संरक्षण मिलता है.

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कागजी हेरफेर का ‘बोकारो रूट’: एनजीटी को ठगने का मास्टर प्लान

स्टॉक यार्ड में चालान की एंट्री के बाद जब हाईवा बालू लेकर हजारीबाग या अन्य गंतव्यों के लिए रवाना होता है, तो चालान में जानबूझकर ‘बोकारो साइड स्टॉक’ का पता दर्ज किया जाता है. सूत्रों के अनुसार, इसके पीछे एक कानूनी पेंच है. एनजीटी के प्रतिबंध काल (जून से अक्टूबर) के दौरान एक ही चालान का इस्तेमाल बोकारो समेत कई जिलों के स्टॉक यार्ड में एंट्री दिखाने के लिए किया जाता है, ताकि जांच के दौरान बालू को वैध साबित किया जा सके. बताया जाता है कि पूरे साल स्टॉक यार्डों में बिना चालान के अवैध बालू जमा की जाती है और एनजीटी लागू होने से पहले फर्जी चालानों के जरिए उसे वैध दर्शाया जाता है. इसके बाद प्रतिबंध अवधि में बालू की कमी का फायदा उठाकर ऊंची कीमतों पर बिक्री कर भारी मुनाफा कमाया जाता है.

एक चालान पर तीन ट्रिप: राजस्व को अरबों की चपत

इस सिंडिकेट की कार्यप्रणाली इतनी दुस्साहसिक है कि एक ही वैध परिवहन चालान (फॉर्म ‘डी’) का उपयोग करके हाईवा गाड़ियां तीन-तीन बार चक्कर लगाती हैं. इस ‘एक चालान, तीन ट्रिप’ की नीति के कारण झारखंड सरकार को सालाना करोड़ों नहीं, बल्कि अरबों रुपये के राजस्व का प्रत्यक्ष नुकसान हो रहा है. सूत्रों का दावा है कि इस पूरे अवैध परिचालन की निगरानी के लिए सड़कों पर तैनात मजिस्ट्रेट और चेकपोस्ट प्रभारियों की भूमिका भी पूरी तरह संदिग्ध है, जो सब कुछ जानकर भी आंखें मूंदे बैठे हैं.

ED की दबिश बेअसर: पूनम, सूर्य और मनोज दांगी यार्ड पर टिकी नजरें

झारखंड में अवैध खनन को लेकर केंद्रीय जांच एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय बेहद आक्रामक है. हाल के दिनों में क्षेत्र के कई प्रमुख बालू डंपिंग और स्टॉक यार्डों पर ईडी की टीम ने दबिश दी है. इनमें मुख्य रूप से पूनम स्टॉक यार्ड (बड़कागांव), सूर्य स्टॉक यार्ड और मनोज दांगी स्टॉक यार्ड शामिल है. ये सभी यार्ड वर्तमान में ईडी के रडार पर हैं और जांच का सामना कर रहे हैं. इसके बावजूद, इन रसूखदार माफियाओं में कानून का कोई खौफ नहीं दिख रहा है. केंद्रीय एजेंसियों की जांच के बीच भी इन स्टॉक यार्डों से हर रात सैकड़ों हाईवा के जरिए अवैध बालू की ढुलाई धड़ल्ले से जारी है.

ग्रामीणों का फूटा गुस्सा

स्थानीय ग्रामीणों से जब इस संबंध में बात की गई, तो उनका आक्रोश साफ देखने को मिला. प्रभावित ग्रामीणों ने रोते हुए बताया, हमारी रैयती जमीनें जो नदी के किनारे थीं, वो इस अंधाधुंध अवैध बालू उठाव के कारण आई बाढ़ में पूरी तरह कटकर नदी में बह गईं. माफिया भारी मशीनें लगाकर नदी का सीना चीर रहे हैं, जिससे नदी का प्राकृतिक मार्ग बदल गया है. हम किसान पूरी तरह बर्बाद हो गए हैं, लेकिन हमारी सुनने वाला कोई नहीं है. अधिकारी सिर्फ अपनी जेबें भर रहे हैं.

प्रशासनिक साठगांठ का पर्दाफाश

स्थानीय पुलिस और प्रशासन द्वारा की जाने वाली इक्का-दुक्का कार्रवाइयां बालू माफियाओं के लिए महज एक दिखावा साबित हो रही हैं. जब तक माइनिंग विभाग के उच्च अधिकारियों, स्थानीय सांठगांठ करने वाले अफसरों और चेक नाका प्रभारियों की जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक बिहार के चालान और झारखंड की नदियों के इस खूनी खेल को रोक पाना असंभव है. एनजीटी के नियमों को ठेंगा दिखाकर जारी यह खेल न सिर्फ पर्यावरण को गर्त में धकेल रहा है, बल्कि सूबे के खजाने को भी खोखला कर रहा है.

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