559 दिनों की देरी के कारण राज्य सरकार की अपील HC से खारिज, आंगनबाड़ी सेविका की बहाली का रास्ता साफ

Ranchi : सरकारी मुकदमों में प्रशासनिक और नौकरशाही के ढुलमुल कार्यप्रणाली पर झारखंड हाईकोर्ट ने एक बार फिर बेहद कड़ा रुख अपनाया...

हाईकोर्ट

Ranchi : सरकारी मुकदमों में प्रशासनिक और नौकरशाही के ढुलमुल कार्यप्रणाली पर झारखंड हाईकोर्ट ने एक बार फिर बेहद कड़ा रुख अपनाया है. अदालत ने देवघर की एक आंगनबाड़ी सेविका की सेवा बहाली के खिलाफ राज्य सरकार द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया है. सरकार की ओर से इस अपील को दायर करने में 559 दिनों की देरी की गई थी. जिसके पक्ष में कोर्ट को कोई पर्याप्त कारण नजर नहीं आया. हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एम.एस. सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने सरकार के विलंब माफी के आवेदन को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि फाइलें घुमाने और विभागीय मंजूरियों जैसी नियमित नौकरशाही प्रक्रियाओं के नाम पर वैधानिक समय-सीमा का उल्लंघन नहीं किया जा सकता.

क्या है मामला

यह मामला देवघर जिले के चंदनपुरा में तैनात आंगनबाड़ी सेविका सकीला बानू की बर्खास्तगी से जुड़ा है. सकीला को साल 2007 में आम सभा के जरिए नियुक्त किया गया था. लगभग 10 साल की सेवा के बाद अक्टूबर 2016 में प्रशासन ने उन पर फर्जी शैक्षणिक प्रमाण पत्र का आरोप लगाकर सेवा से बर्खास्त कर दिया था. सकीला बानू ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी. 9 अगस्त 2023 को एकल पीठ के न्यायाधीश जस्टिस एस.एन. पाठक ने उनकी बर्खास्तगी को रद्द कर दिया था. कोर्ट ने पाया था कि प्रशासन ने बिना उचित जांच के यह कार्रवाई की और आरटीआई से मिले उन दस्तावेजों को नजरअंदाज कर दिया, जो सकीला के प्रमाणपत्रों को सही साबित करते थे.

एकल पीठ के आदेश के बाद सरकार ने की देरी

एकल पीठ ने सरकार को आदेश दिया था कि सकीला बानू को उनके पिछले सभी बकाया मानदेय और लाभों के साथ सेवा में बहाल किया जाए. राज्य सरकार ने इस आदेश के खिलाफ अपील दायर करने में 559 दिन लगा दिए. हाईकोर्ट की खंडपीठ ने जब फाइलों के रिकॉर्ड को देखा तो पाया कि महीनों तक सरकारी महकमों में कोई काम ही नहीं हुआ. जुलाई 2024 में अपील का मसौदा तैयार होने के बाद भी इसे मार्च 2025 में दाखिल किया गया यानी पूरे 8 महीने का कोई हिसाब नहीं था.

लंबी निष्क्रियता को सही नहीं ठहरा सकती सरकार

सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि सरकार केवल फाइलों की आवाजाही और कानूनी राय लेने का बहाना बनाकर लंबी निष्क्रियता को सही नहीं ठहरा सकती. अदालतों का काम प्रशासनिक सुस्ती को बढ़ावा देना नहीं है. गौरतलब है कि पिछले तीन हफ्तों में इसी खंडपीठ ने सरकार की दो अन्य अपीलों को भी खारिज किया है.जिनमें 762 और 475 दिनों की भारी देरी की गई थी. कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए साफ किया कि समय-सीमा के कानून के तहत सरकारी विभागों को कोई विशेष या तरजीही छूट नहीं दी जा सकती. इस फैसले के बाद सकीला बानू की बहाली का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है.

 

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