Saraikela: स्वर्णरेखा नदी तट पर स्थित सपारुम का 75 प्रतिशत वन क्षेत्र पिछले कई सालों से दलमा के हाथियों की शरणस्थली बना हुआ है. हाथियों का झुंड अक्सर भोजन और पानी की तलाश में इस इलाके में डेरा डालता है.
मुठभेड़ में मौत
पिछले दिनों कुकडू अंचल के सपारुम जंगल में राधानाथ तंतुबाई की मौत जंगली हाथी के साथ मुठभेड़ में हो गई.
अवैध गतिविधियों पर सवाल
मगर सवाल यह उठता है कि जिस स्थान पर राधानाथ तंतुबाई की मौत हुई है, वहां जंगल में बालू का अवैध स्टॉक और नदी से लाए गए बालू का कारोबार क्या इसके लिए जिम्मेदार है.
बढ़ता संघर्ष
पिछले दिनों मानव-हाथी संघर्ष में लगातार बढ़ोतरी देखने को मिल रही है. इसके पीछे वन क्षेत्र में हो रही अवैध गतिविधियों को कारण बताया जा रहा है.
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जीरो डिस्टेंस NOC विवाद
ऐसे में हाथी बहुल क्षेत्र में ‘जीरो डिस्टेंस’ पर गैर वानिकी गतिविधियों के लिए NOC जारी किए जाने पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं. पर्यावरणविदों और स्थानीय लोगों का कहना है कि वन सीमा से 250 मीटर दूरी का नियम होने के बावजूद 0 मीटर पर NOC देना सीधे तौर पर वन्यजीव संरक्षण नियमों का उल्लंघन है.
आवास पर खतरा
विशेषज्ञों के अनुसार वन क्षेत्र में बालू भंडारण और अन्य व्यावसायिक गतिविधियों से हाथियों का प्राकृतिक आवास सिमट रहा है. भोजन और पानी की कमी तथा लगातार मानवीय दखल के कारण हाथी रिहायशी इलाकों की ओर बढ़ रहे हैं, जिससे संघर्ष की घटनाएं बढ़ रही हैं.
कार्रवाई की मांग
स्थानीय लोगों ने मांग की है कि ऐसे संवेदनशील क्षेत्र में गैर वानिकी गतिविधियों के लिए NOC देने वाले अधिकारियों पर संज्ञान लिया जाए. दोषी अधिकारियों की जवाबदेही तय हो, ताकि हाथियों को उचित आश्रय मिल सके और संघर्ष की घटनाओं में कमी आए.
विभाग से अपील
वन, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन विभाग से अपील की गई है कि दलमा इको सेंसिटिव जोन के नियमों का कड़ाई से पालन कराया जाए. वन क्षेत्र को हाथियों के लिए सुरक्षित छोड़ा जाए, नहीं तो आने वाले समय में स्थिति और भयावह हो सकती है.
