Ravi Bharti
Ranchi: धूप-छांव के खेल के बीच हवा में तैरती मालपुए और जलेबियों की खुशबू. दूर से गूंजती बांसुरी की तान और नगाड़ों की धमक. चारों ओर नजर दौड़ाएं तो जिधर देखिए, उधर ही पसरा रंग-बिरंगा संसार. यह कोई आम बाजार नहीं, बल्कि झारखंड की धड़कन कहा जाने वाला ऐतिहासिक जगन्नाथपुर मेला है. यह मेला इस बार अपने भीतर हजारों रंग समेटे हुए पूरे शबाब पर है, बस बोलो क्या-क्या खरीदोगे….. इस मेले के एक ऐसे ही सजीव सफर पर, जहां परंपराओं का उल्लास भी है और आधुनिकता की चमक भी. मेले में आए लोग दो टूक कहते भी है कि मॉल में सब कुछ पैक्ड मिलता है, लेकिन मेले में पत्थर की सिलहट या लकड़ी का चकला छूकर खरीदने का जो मजा है, वो कहीं और नहीं.यहां की चीजें सालों-साल चलती हैं.
चूल्हे-चौके से लेकर खेती-किसानी तक
मेले के एक छोर पर कदम रखते ही ग्रामीण और शहरी जीवन की एक बेहद खूबसूरत जुगलबंदी देखने को मिलती है. आधुनिक मॉल के इस दौर में भी जगन्नाथपुर मेला आज घरेलू जरूरतों का सबसे बड़ा केंद्र बना हुआ है. मेले में गृहणियों की भारी भीड़ उमड़ रही है. रसोई को सजाने और संवारने के लिए यहां लकड़ी के बेहतरीन बेलन, चकला, करछुल, दलघोटनी और लकड़ी के चम्मचों की भरमार है.
लोहे और पत्थर के औजारों का बाजार
एक तरफ जहां मसाला पीसने के लिए पत्थर की सिलहट (लोढ़ी-सिल्ला) और ओखली बिक रही है, वहीं दूसरी तरफ सब्जी काटने के पारंपरिक यंत्र (हसुआ) लोगों को खूब आकर्षित कर रहे हैं. ग्रामीण इलाकों से आए किसानों के लिए यह मेला किसी वरदान से कम नहीं है. लकड़ी काटने के लिए मजबूत टांगी (कुल्हाड़ी), खेतों को गोड़ने के लिए कुदाल और फरसा की दुकानों पर खरीदारों की भारी भीड़ देखी जा रही है. लोग मोल-तोल करते और लोहे की शुद्धता परखते नजर आ रहे हैं.

श्रृंगार और फैशन का सतरंगी गलियारा
जैसे ही आप मेले के बीचोबीच पहुंचते हैं, रंग-बिरंगी चूड़ियों और कानों के झूमकों की खनक आपका स्वागत करती है. यह कोना पूरी तरह से महिलाओं और युवतियों के नाम रहा. आर्टिफिशियल ज्वेलरी में कान की बाली, झुमके, ट्रेंडी इयररिंग्स और चमचमाती चेन.पारंपरिक अलता, सिंदूर से लेकर लेटेस्ट शेड्स की लिपस्टिक और नेल पॉलिश के अलावा हर वैरायटी के दुपट्टे, जयपुरी चुनरी, साड़ियां और स्टाइलिश लेडिज बैग महिलाओं को काफी आकर्शित कर रही हैं. दुकानों पर लगी लाइटों की रोशनी में जब आर्टिफिशियल ज्वेलरी चमकती है, तो युवतियों की आंखें भी खुशी से चमक उठती हैं. कॉलेज की छात्राओं से लेकर घर-बुजुर्ग महिलाओं तक, हर कोई अपनी पसंद के मैचिंग कंगन और झुमके तलाशने में मशगूल है. मोल-भाव का दौर भी जोरों पर है, जो इस मेले की जीवंतता को और बढ़ा देता है.
झारखंड के पारंपरिक वाद्ययंत्रों ने बिखेरा जादू
इस मेले की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह अपनी माटी की खुशबू को कभी नहीं छोड़ता. मेले के एक विशेष हिस्से में झारखंड के पारंपरिक वाद्ययंत्रों की दुकानें सजी हुई हैं, जो दूर से ही लोगों को अपनी ओर खींच रही हैं. ढ़ोल, नगाड़ा, बांसुरी और तुरही की आवाजें मिलकर एक ऐसा लोक-संगीत तैयार कर रही हैं, जिसे सुनकर पैर अपने आप थिरकने लगते हैं. सूखी और पकी हुई बांस से बनी बांसुरियों को जब कारीगर फूंक मारकर बजाते हैं, तो मेले का पूरा माहौल जादुई हो जाता है. बहुत से शहरी युवा और बच्चे इन पारंपरिक वाद्ययंत्रों को कौतूहल से देख रहे हैं और इन्हें बजाने का प्रयास कर रहे हैं.

लजीज व्यंजनों की खुशबू से महका आसमान
मेले की सैर तब तक अधूरी है, जब तक कि जीभ को लजीज व्यंजनों का स्वाद न मिले. जगन्नाथपुर मेले में खाने-पीने के शौकीनों के लिए एक से बढ़कर एक इंतजाम हैं.चारों तरफ से आ रही गर्म-गर्म छनते मालपुओं और जलेबियों की खुशबू लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है. बड़े-बड़े कड़ाहों में उबलती चाशनी और उसमें छनती कुरकुरी जलेबियां, खाजा और झारखंड का खास मालपुआ लोगों की पहली पसंद बने हुए हैं.छोले-भटूरे, चाट-पकौड़ी, गुपचुप (पानीपुरी) और भेलपूरी के ठेलों पर पैर रखने की जगह नहीं है. बच्चे जहां आइसक्रीम और कॉटन कैंडी के लिए मचल रहे हैं, वहीं बड़े-बुजुर्ग पारंपरिक मिठाइयों का लुत्फ उठा रहे हैं.
वजन मशीन से लेकर फोटो शूट तक का रोमांच
मेले में घूमते हुए अचानक एक जगह टिन-टिन की आवाज सुनाई देती है. यह आवाज है उस वजन नापने वाली मशीन की, जो कभी हर रेलवे स्टेशन और मेले की जान हुआ करती थी. रंग-बिरंगी लाइटों से सजी इस मशीन पर खड़े होकर अपना वजन देखना और वहां से निकलने वाले कार्ड को सहेज कर रखना, आज भी लोगों के लिए एक अलग ही रोमांच है. इसके साथ ही, डिजिटल दौर में भी मेले का एक पुराना रंग आज भी जिंदा है वह है फोटोग्राफर का स्टाल. परिवारों, दोस्तों और प्रेमियों के ग्रुप को एक साथ फ्रेम में कैद करने के लिए फोटोग्राफर्स बेहतरीन एंगल और रंग-बिरंगे बैकड्रॉप के साथ मुस्तैद हैं. लोग मुस्कुराते हुए पोज़ दे रहे हैं, ताकि इस मेले की यादों को हमेशा के लिए अपने घर की दीवारों या एल्बम में सहेज सकें. हालांकि अब मोबाइल से सेल्फी लेने का भी खूब क्रेज है, लेकिन मेले के फोटोग्राफर से तुरंत प्रिंट की गई तस्वीर हाथ में पाने की खुशी कुछ और ही है.
एक अटूट अहसास
जैसे-जैसे शाम ढलती है, जगन्नाथपुर मेले की रौनक दोगुनी हो जाती है. हैलोजन लाइटों और रंग-बिरंगी कड़ियों की रोशनी में पूरा मेला क्षेत्र किसी चमचमाती नगरी जैसा दिखने लगता है. यह मेला सिर्फ एक बाजार नहीं, बल्कि एक ऐसा जरिया है जो समाज के हर वर्ग को एक सूत्र में पिरोता है. यहां अमीर-गरीब, गांव-शहर का भेद मिट जाता है. हजारों रंगों को अपने आंचल में समेटे झारखंड का यह ऐतिहासिक जगन्नाथपुर मेला इस बात का जीवंत प्रमाण है कि वक्त चाहे कितना भी बदल जाए, हमारी परंपराओं, हमारे मेल-मिलाप और हमारी संस्कृति की जड़ें आज भी बेहद मजबूत हैं.
