Ranchi: झारखंड सरकार ने जंगलों की अंधाधुंध कटाई और अतिक्रमण के खिलाफ बड़ा एक्शन प्लान तैयार किया है. यह एक्शन प्लान वन विभाग और कैंपा तैयार किया है. राज्य में पहली बार स्ट्रेटजी एंड एक्शन प्लान फॉर कंजर्वेशन ऑफ कॉरिडोर्स (एसएपीसीसी) को धरातल पर उतारने की तैयारी पूरी कर ली गई है. इसकी जरूरत इसलिए पड़ी कि राज्य में शहरों का विस्तार, राजमार्गों का जाल और कृषि के लिए जंगलों की सफाई ने झारखंड के पारिस्थितिकी तंत्र को छोटे-छोटे टुकड़ों में बांट दिया है. जब वन्यजीव एक सुरक्षित जंगल से दूसरे जंगल की ओर जाने की कोशिश करते हैं, तो वे इंसानी बस्तियों में भटक जाते हैं, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं भयावह रूप ले लेती हैं. इस योजना का मुख्य उद्देश्य इन खंडित जंगलों को ‘कॉरिडोर’ के जरिए आपस में जोड़ना है, ताकि बाघ, हाथी और अन्य जंगली जानवर बिना किसी डर के घूम सकें और उनकी जेनेटिक विविधता बरकरार रह सके.
10,715 वर्ग किलोमीटर का होगा विशाल सुरक्षा कवच
इस योजना के तहत राज्य में 75 संभावित वन्यजीव गलियारे चिन्हित किए गए हैं. इन गलियारों की कुल लंबाई 3,649 किलोमीटर से अधिक है. यह कॉरिडोर नेटवर्क कुल 10,715.63 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला होगा. यह इलाका झारखंड के कुल वन क्षेत्र का करीब 45% हिस्सा है. सरकार का संकल्प है कि इस पूरे क्षेत्र को संरक्षण अनुकूल प्रबंधन के दायरे में लाया जाए, जिससे राज्य का 16% से अधिक भौगोलिक हिस्सा अब वन्यजीवों के लिए सुरक्षित बन जाएगा. यह योजना पांच चरणों में अगले एक दशक तक चलेगी. पहले चरण में उन गलियारों को प्राथमिकता दी जाएगी जिन्हें वेरी हाई प्रायोरिटी या क्रिटिकल घोषित किया गया है. इसके बाद धीरे-धीरे इसका दायरा बढ़ाया जाएगा.
हाथी और बाघों के लिए सेफ पैसेज
इस पूरे प्रोजेक्ट का केंद्र-बिंदु राज्य के फ्लैगशिप प्रजातियां—हाथी और बाघ हैं. उनके लिए ये गलियारे सिर्फ रास्ता नहीं, बल्कि जीवन की डोर हैं. योजना में यह स्पष्ट है कि यदि हम इन गलियारों को नहीं बचा पाए, तो ये प्रजातियां अलग-थलग पड़ जाएंगी, जिससे उनकी संख्या कम होने और अंततः विलुप्त होने का खतरा बढ़ जाएगा.
इंसानी दखल और भविष्य की चुनौती
वन विभाग ने इस योजना में केवल जंगली जानवरों को नहीं, बल्कि स्थानीय समुदायों के कल्याण को भी शामिल किया है. झारखंड इकोलॉजिकल कॉरिडोर नेटवर्क फॉर नेचर कंजर्वेशन एंड ह्यूमन वेल बीइंग का लक्ष्य यही है कि इंसान और जानवर एक-दूसरे के दुश्मन न बनकर, सह-अस्तित्व में रहें. इसके लिए फॉरेस्ट डिवीजन स्तर पर विशेष टीमें बनाई जाएंगी जो इन गलियारों की सुरक्षा और निगरानी करेंगी.
तकनीक पर रहेगा जोर
इसके लिए आधुनिक तकनीक का सहारा लिया जा रहा है. सैटेलाइट इमेजिंग, जीआइएस मैपिंग और डिजिटल टूलबॉक्स के माध्यम से वन अधिकारियों को यह पता होगा कि किस जंगल के टुकड़े में किस समय हस्तक्षेप की जरूरत है.राज्य के छह मुख्य वन क्षेत्र जैसे बोकारो, हजारीबाग, पलामू, रांची, संथाल परगना और सिंहभूम को इस विशाल नेटवर्क के प्रमुख केंद्रों के रूप में विकसित किया जा रहा है.
तीन स्तरों पर होगा काम
• इंटेंसिव मैनेजमेंट ज़ोन: जहां सबसे अधिक ध्यान दिया जाएगा और इंसानी दखल को पूरी तरह प्रतिबंधित किया जाएगा.
• मॉडरेट मैनेजमेंट ज़ोन: जहां बफर के तौर पर विकास के काम होंगे लेकिन वन्यजीवों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाएगी.
• लो मैनेजमेंट ज़ोन: बाहरी इलाका जहाँ कम सघन निगरानी रखी जाएगी.
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