झारखंड की रेशमी उड़ान: तसर और बुनाई ने बदली गांवों की तकदीर, 900% तक बढ़ा कारीगरों का मुनाफा

Ranchi: झारखंड के ग्रामीण इलाकों में पारंपरिक हुनर अब केवल विरासत सहेजने का जरिया नहीं, बल्कि समृद्धि का नया पैमाना बन चुका...

Ranchi: झारखंड के ग्रामीण इलाकों में पारंपरिक हुनर अब केवल विरासत सहेजने का जरिया नहीं, बल्कि समृद्धि का नया पैमाना बन चुका है. राज्य सरकार के आंकड़ों के अनुसार झारखंड के शिल्पकारों और रेशम पालकों के जीवन में एक बड़ा इनकम शिफ्ट यानी आय परिवर्तन आया है. विशेष रूप से तसर रेशम और बुनाई के क्षेत्र में आय में उछाल आया है.

बुनकरों की स्थिति में क्रांतिकारी सुधार

राज्य में बुनकरों की स्थिति में क्रांतिकारी सुधार दर्ज किया गया है. सरकार के आंकड़ों के अनुसार जो बुनकर पहले मात्र 1,500 से 2,000 रुपये प्रति माह की मामूली आय पर गुजारा करते थे, उनकी आय में अब 300 से 400 प्रतिशत का उछाल आया है. आज झारखंड के कुशल बुनकर 6,000 से 8,000 रुपये प्रति माह तक कमा रहे हैं. आय में इस वृद्धि का मुख्य कारण आधुनिक डिजाइनों का समावेश और बाजार तक सीधी पहुंच है. सरकार द्वारा झारक्राफ्ट जैसे मंचों के माध्यम से बिचौलियों की भूमिका खत्म करने से मुनाफे का बड़ा हिस्सा सीधे कारीगरों की जेब में पहुंच रहा है.

रेशम पालन: एक सीजन में साल भर की कमाई

सबसे चौंकाने वाले और सुखद परिणाम रेशम पालन के क्षेत्र में देखने को मिले हैं. यहां आय में 700 से 900 प्रतिशत की भारी वृद्धि दर्ज की गई है. पहले रेशम पालक एक सीजन में लगभग 4,000 से 5,000 रुपये ही जुटा पाते थे. वर्तमान में उन्नत तकनीक और समृद्धि रीलिंग मशीनों के उपयोग से यह आय अब 35,000 से 40,000 रुपये प्रति सीजन तक पहुंच गई है.

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दुनिया का इकलौता ऑर्गेनिक तसर स्रोत

झारखंड न केवल भारत का अग्रणी तसर रेशम उत्पादक है, बल्कि यह दुनिया का एकमात्र प्रमाणित जैविक तसर रेशम स्रोत भी है. राज्य के तसर रेशम की मांग अब केवल देश में ही नहीं, बल्कि जर्मनी जैसे अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी बढ़ी है, जहां संसाधित रेशम अपशिष्ट का निर्यात किया जा रहा है.

आर्थिक बदलाव की फैक्ट फाइल

सौर ऊर्जा का कमाल: 5,000 से अधिक सौर ऊर्जा संचालित समृद्धि रीलिंग मशीनें तैनात की गई हैं, जिससे उत्पादन क्षमता कई गुना बढ़ गई है.

डिजाइन सपोर्ट: निफ्ट और एनआईडी जैसे संस्थानों के विशेषज्ञों के सहयोग से पारंपरिक ढोकरा शिल्प और बुनाई को आधुनिक रूप दिया गया है.

GI टैग: सोहराय खोवर पेंटिंग जैसे पारंपरिक शिल्पों को मिले भौगोलिक संकेत ने भी वैश्विक स्तर पर झारखंडी कला की ब्रांड वैल्यू बढ़ाई है.

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