Ranchi: कांग्रेस के लिए भाषा का मुद्दा एक ऐसे धर्मसंकट की तरह है जहां वह इधर कुआं, उधर खाई वाली स्थिति में है. पार्टी को अपने पारंपरिक वोट बैंक को सहेजना है, जो क्षेत्रीय भाषाओं की अस्मिता से जुड़ा है. दूसरी तरफ उसे उस व्यापक जनाधार को भी साथ रखना है, जिसके हितों पर भाषा विवाद का सीधा असर पड़ता है. कांग्रेस कोटे से मंत्री राधाकृष्ण किशोर द्वारा अपनी ही पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष से सार्वजनिक रूप से जवाब मांगना, महज एक प्रशासनिक पत्र नहीं है. यह इशारा है कि कांग्रेस के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है. पार्टी अब एक गंभीर आंतरिक वैचारिक संकट से गुजर रही है.
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मंत्री बनाम संगठन की जंग
राधाकृष्ण किशोर, जो भाषा विवाद को सुलझाने के लिए गठित मंत्रियों के समूह के महत्वपूर्ण सदस्य हैं, उन्होंने प्रदेश अध्यक्ष से पार्टी का स्टैंड साफ करने को कहा है. राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यह जवाबदेही मांगने के बहाने संगठन पर अपनी पकड़ मजबूत करने की एक सोची-समझी रणनीति है. जब कोई कैबिनेट मंत्री सार्वजनिक मंच से अपने ही प्रदेश मुखिया पर सवाल खड़ा करता है, तो वह संदेश देता है कि संगठन और सरकार के बीच विश्वास का पुल दरक चुका है. मंत्री राधाकृष्ण किशोर की आक्रामकता ने प्रदेश अध्यक्ष को रक्षात्मक मुद्रा में ला खड़ा किया है.
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झामुमो की वेट एंड वॉच पॉलिसी
कांग्रेस के इस प्रकरण पर सबसे पैनी नजर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और उनकी पार्टी झामुमो की है. गठबंधन सरकार में कांग्रेस सबसे बड़ा सहयोगी दल है. ऐसे में कांग्रेस की अस्थिरता का सीधा असर सरकार के समन्वय और नीतिगत फैसलों पर पड़ना तय है. झामुमो रणनीतिकारों का मानना है कि यदि कांग्रेस अपनी आंतरिक गुटबाजी नहीं सुलझा पाती, तो आने वाले समय में सीट शेयरिंग और महत्वपूर्ण निर्णयों में उसकी सौदेबाजी की शक्ति कमजोर हो जाएगी.
