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रेत के संकट ने छीनी 4 लाख परिवारों की रोटी: क्या 10 दिन का सरकारी अल्टीमेटम बदल पाएगी तस्वीर?

Ranchi: झारखंड में विकास की रफ्तार को ‘बालू’ लग गई है. सरकार ने कागजों पर 298 बालू घाटों की नीलामी तो कर...

Ranchi: झारखंड में विकास की रफ्तार को ‘बालू’ लग गई है. सरकार ने कागजों पर 298 बालू घाटों की नीलामी तो कर दी, लेकिन धरातल पर वैध बालू आज भी एक लग्जरी आइटम बना हुआ है. राज्य सरकार ने 444 चिह्नित घाटों में से 67 फीसदी यानी (298) की नीलामी प्रक्रिया पूरी कर ली है, लेकिन एनवायरमेंट क्लीयरेंस की पेचीदगियों के कारण ये बालू घाट शुरू नहीं हो पाए हैं. नतीजा यह है कि बाजार में मांग और आपूर्ति के बीच 60 फीसदी का विशाल अंतर पैदा हो गया है.

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सरकार का एक्शन मोड, 10 दिन का अल्टीमेटम

बढ़ते दबाव और अवैध कारोबार की शिकायतों के बीच अब खान विभाग ने सख्ती दिखाई है. सोमवार को हुई हाई-लेवल टास्क फोर्स की बैठक में सभी जिलों के उपायुक्तों को स्पष्ट चेतावनी दी गई है. 17 जिलों के 35 बालू घाटों की लीज प्रक्रिया को अगले 10 दिनों के भीतर हर हाल में पूरा करने का आदेश दिया गया है.

अबुआ आवास से फ्लाईओवर तक संकट

• अधूरी योजनाएं: मुख्यमंत्री की महत्वाकांक्षी अबुआ आवास योजना के तहत बन रहे लाखों घर बालू की अनुपलब्धता के कारण अधर में लटके हैं.
• बुनियादी ढांचा: रांची रिंग रोड, बन रहे फ्लाईओवर और नल-जल योजना के तहत पानी की टंकियों का निर्माण या तो ठप है या धीमी गति से चल रहा है.
• राजस्व की चपत: सरकारी प्रोजेक्ट्स में देरी से लागत बढ़ रही है और खजाने को करोड़ों का नुकसान हो रहा है.

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रोजगार पर रेतीली मार

झारखंड में बालू केवल निर्माण सामग्री नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की लाइफलाइन है. इस संकट ने सीधे तौर पर 50 से 70 हजार मजदूरों के हाथ खाली कर दिए हैं. वहीं, राजमिस्त्री, ट्रक-हाइवा मालिक और ठेकेदारों समेत करीब 4 लाख परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है.

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