Gumla : सरस्वती शिशु विद्या मंदिर, गुमला में दो दिवसीय संकुल स्तरीय शिशु वाटिका कार्यशाला की शुरूआत हुई. इस कार्यशाला में गुमला संकुल के विभिन्न विद्यालयों— भरनो, कैम्बा टेंगेरिया, आदर, मुर्गो और सिसई की वाटिका दीदी उत्साहपूर्वक भाग ले रही हैं. कार्यक्रम का उद्घाटन विद्यालय प्रबंधन समिति के अध्यक्ष रामकिशोर रजक, सचिव विजय बहादुर सिंह, पूर्व विभाग शिशु वाटिका प्रमुख पूनम सारंगी, प्राचार्य जितेन्द्र तिवारी एवं कार्यक्रम प्रमुख अर्चना मिश्रा ने संयुक्त रूप से दीप जलाकर किया. प्राचार्य जितेन्द्र तिवारी ने कार्यशाला की प्रस्तावना रखते हुए कहा कि शिशु वाटिका का मूल आधार शिशुओं में पंचकोष का विकास करना है. उन्होंने जोर देकर कहा, यदि हम बच्चों में शारीरिक, प्राणिक, मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक विकास के 12 क्रियाकलापों को सही ढंग से लागू करें, तो हम एक श्रेष्ठ और आदर्श नागरिक की नींव रख सकते हैं. शारीरिक, मानसिक विकास, आध्यात्मिक विकास का संतुलन ही एक आदर्श नागरिक की नींव है. वहीं, विशेषज्ञ पूनम सारंगी ने शिशु वाटिका की 12 शैक्षिक व्यवस्थाओं की बारीकियों और उनकी उपयोगिता पर विस्तृत प्रकाश डाला. उन्होंने अपील की, कि वह बालकों को मां तथा दादी बनकर शिक्षा दें.
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“शिशु कच्ची मिट्टी के समान, सही आकार देने की जरूरत”
वहीं विद्यालय के सचिव विजय बहादुर सिंह ने कहा कि शिशु उस कच्ची मिट्टी के समान होते हैं, जिन्हें जैसा रूप दिया जाए वे वैसे ही बन जाते हैं. उन्होंने उपस्थित सभी दीदी से आह्वान करते हुए कहा कि हमारी शिशु वाटिका केवल एक पाठशाला नहीं बल्कि वह संस्कारशाला है, जहां खेल-खेल में बच्चों के व्यक्तित्व को निखारा जाता है. हमें ऐसी शिक्षा पद्धति पर काम करना है जहां बच्चा विद्यालय आने के लिए डरे नहीं, बल्कि उत्साहित रहे. एक शिक्षिका का स्नेह ही बच्चे की छिपी प्रतिभा को उजागर कर सकता है. दो दिनों तक चलने वाली इस कार्यशाला में प्रशिक्षण के साथ-साथ कई रचनात्मक गतिविधियां भी आकर्षण का केंद्र होंगे.

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नन्हे शिशुओं ने बनाई सुंदर कलाकृतियां
कार्यशाला में शिशुओं ने सुंदर कलाकृतियां बनाई और उसका प्रदर्शन किया गया. रंगमंच एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम, बच्चों और दीदी जी द्वारा विभिन्न रचनात्मक प्रस्तुतियां दी गयी. शारीरिक और मानसिक स्फूर्ति के लिए विशेष रूप से डिजाइन किए गए खेलों का अभ्यास पर जोर दिया गया. इस कार्यशाला के माध्यम से शिक्षकों को आधुनिक और पारंपरिक शिक्षा पद्धति के समन्वय का प्रशिक्षण दिया जा रहा है, ताकि ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों को भी वैश्विक स्तर की गुणवत्तापूर्ण और सुसंस्कृत शिक्षा प्राप्त हो सके.
