Ranchi: झारखंड कांग्रेस में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है. रविवार को कांग्रेस पार्टी की तरफ से नई कमेटी का गठन किया गया, जिसके बाद पार्टी पदाधिकारियों पर परिवारवाद के आरोप लगे. अब एक दिन के बाद झारखंड सरकार के मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राधाकृष्ण किशोर ने भी पार्टी के खिलाफ बिगुल फूंक दिया है. उन्होंने पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष केशव महतो कमलेश को एक चिट्ठी लिखी है, जिसमें तमाम तरह के सवाल उठाए हैं. इसके फौरन बाद खबर चलने लगी की मंत्री राधाकृष्ण किशोर के बेटे प्रशांत किशोर ने पार्टी के सचिव पद से इस्तीफा दे दिया है. पार्टी की तरफ से रविवार को जारी नोटिस में प्रशांत किशोर को कांग्रेस पार्टी में सचिव पद पर नियुक्त किया गया था. उसके एक दिन बाद ही प्रशांत किशोर ने सचिव पद से इस्तीफा दे दिया है.
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ऐसे शुरू हुआ विवाद
राज्य के वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी के राजू को पत्र लिखकर संगठन की कार्यशैली पर कड़ी आपत्ति दर्ज की है. किशोर ने तीखे लहजे में कहा कि वर्तमान में झारखंड प्रदेश कांग्रेस की स्थिति “एक आंख में सुरमा और दूसरी में काजल” वाली कहावत को चरितार्थ कर रही है. यहां निष्ठावान कार्यकर्ताओं की बलि दी जा रही है और बागियों को पुरस्कृत किया जा रहा है. राधाकृष्ण किशोर ने सीधे तौर पर दो बड़े चेहरों का उदाहरण देते हुए पार्टी के ‘दोहरे चरित्र’ को उजागर किया. उन्होंने पूछा है कि योगेंद्र साव का दोष क्या था? बड़कागांव के मजबूत स्तंभ और पूर्व मंत्री योगेंद्र साव को आखिर किस आधार पर तीन साल के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया गया? कार्यकर्ता इस ‘अन्याय’ का जवाब मांग रहे हैं. दूसरी ओर, रमा खालखो जिन्होंने सार्वजनिक मंचों से कांग्रेस और आलाकमान को जमकर कोसा, उन्हें पार्टी ने चुनाव प्रबंधन समिति जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंप दी.
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‘जंबो-जेट’ समिति बनाम धरातल की हकीकत
81 सीटों वाली विधानसभा के लिए कांग्रेस द्वारा घोषित 314 सदस्यों की भारी-भरकम (जंबो-जेट) समिति पर तंज कसते हुए किशोर ने कहा कि इतनी बड़ी फौज चुनाव में कितनी कारगर होगी, यह तो वक्त बताएगा. उन्होंने स्पष्ट किया कि देश के हालिया चुनावी नतीजों से सबक लेने के बजाय प्रदेश कांग्रेस कमिटी भीड़ जुटाने में व्यस्त है.
कई मायने है किशोर के बयानों के
राधाकृष्ण किशोर का इशारा साफ है. झारखंड कांग्रेस को भारी-भरकम समितियों की नहीं, बल्कि मजबूत और ईमानदार नेतृत्व की जरूरत है. उनके अनुसार यदि प्रदेश नेतृत्व के ढांचे में बुनियादी बदलाव नहीं किया गया, तो संगठन की मजबूती केवल एक कल्पना बनकर रह जाएगी.
