न्यूज डेस्क
रोजमर्रा की छोटी-छोटी खरीदारी अब आपकी जेब पर बड़ा असर डाल सकती है. साबुन, बिस्किट, शैम्पू, डिटर्जेंट और खाने-पीने की कई दूसरी चीजों के दाम आने वाले दिनों में बढ़ सकते हैं. खास बात यह है कि कंपनियां हर बार सीधे MRP बढ़ाने के बजाय ‘श्रिंकफ्लेशन’ का रास्ता भी अपना सकती हैं. यानी कीमत वही रहेगी, लेकिन पैकेट के अंदर सामान की मात्रा कम हो जाएगी.
5 और 10 रु. वाले पैकेट पर पड़ सकता है असर
महंगाई और कच्चे माल की बढ़ती कीमतों ने FMCG कंपनियों की लागत बढ़ा दी है. ऐसे में कम कीमत वाले उत्पादों की MRP बढ़ाना कंपनियों के लिए जोखिम भरा हो सकता है. इसलिए छोटे पैकेट के वजन या मात्रा में मामूली कटौती की जा सकती है. इसका सीधा मतलब है कि अगर कोई बिस्किट का पैकेट पहले 10 रु. में मिलता था, तो उसकी कीमत 10 ही रह सकती है, लेकिन उसमें बिस्किट की संख्या या कुल वजन पहले के मुकाबले कम हो सकता है। इसी तरह साबुन के पैकेट में भी मात्रा घटने की संभावना जताई जा रही है.
2 से 5 फीसदी तक बढ़ सकती है लागत
FMCG सेक्टर में इस्तेमाल होने वाले कई कच्चे माल की कीमतों में बढ़ोतरी से कंपनियों की लागत पर दबाव बढ़ा है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, सितंबर तिमाही में इनपुट कॉस्ट में करीब 2 से 5 फीसदी तक बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है. ब्रिटानिया की ओर से छोटे पैक में वजन घटाने के संकेत दिए गए हैं. वहीं डाबर, हिंदुस्तान यूनिलीवर, गोदरेज कंज्यूमर और टाटा कंज्यूमर जैसी कंपनियां भी बढ़ती लागत से निपटने के लिए कीमतों में बदलाव या पैकेजिंग में मात्रा कम करने जैसे विकल्पों पर विचार कर सकती हैं.
क्यों बढ़ रहा है FMCG कंपनियों पर दबाव?
इसके पीछे कई वजहें हैं। खाद्य तेल और चीनी जैसी चीजों की कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर बिस्किट, नमकीन और बेकरी उत्पादों पर पड़ता है. दूसरी ओर कच्चे तेल की कीमतों और परिवहन लागत में बढ़ोतरी से साबुन, शैम्पू और डिटर्जेंट जैसे उत्पादों की लागत प्रभावित होती है. इसके अलावा मौसम में बदलाव और अनियमित मानसून की आशंका से कृषि आधारित कच्चे माल की सप्लाई पर भी दबाव पड़ सकता है.
ग्राहक को कैसे लगेगा ‘खामोश झटका’?
महंगाई का असर ग्राहक को दो तरीकों से महसूस हो सकता है. पहला, कंपनियां सीधे उत्पाद की कीमत बढ़ा सकती हैं. दूसरा, MRP को पहले जैसा रखते हुए पैकेट में मौजूद सामान की मात्रा कम कर सकती हैं. यही श्रिंकफ्लेशन है. इसमें ग्राहक को पहली नजर में कीमत बढ़ी हुई नजर नहीं आती, लेकिन समान रकम में पहले की तुलना में कम उत्पाद मिलता है. ऐसे में आने वाले महीनों में खरीदारी करते समय सिर्फ MRP देखना काफी नहीं होगा। ग्राहकों को पैकेट पर लिखे वजन, मात्रा और प्रति यूनिट कीमत पर भी नजर रखनी होगी.
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