Hazaribagh: कभी बच्चों की किलकारियों से गूंजने वाले स्कूल आज खामोश खड़े हैं. ब्लैकबोर्ड पर लिखे सपने धुंधले पड़ चुके हैं और कक्षाओं की दीवारें अपने अस्तित्व पर सवाल करती नजर आ रही हैं. जिले के सैकड़ों निजी स्कूल यू-डाइस कोड के बिना अपनी पहचान बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. यह कोड केवल एक संख्या नहीं, बल्कि स्कूलों की मान्यता, सम्मान और भविष्य का आधार बन चुका है.
कोरोना काल के बाद बिगड़ी व्यवस्था
संचालकों के अनुसार वर्ष 2014 से कई स्कूलों के पास यू-डाइस कोड था और 2019 तक नए स्कूल भी पूरी व्यवस्था के साथ संचालित हो रहे थे. लेकिन कोरोना काल के दौरान स्कूल बंद होने और आवश्यक आंकड़े समय पर नहीं दे पाने के कारण कई संस्थानों का कोड बंद कर दिया गया. अब जब हालात सामान्य हो चुके हैं, तब भी इन स्कूलों की पहचान बहाल नहीं की गई है.
400-500 बच्चों की पढ़ाई और शिक्षकों की रोजी-रोटी पर खतरा
सबसे गंभीर स्थिति यह है कि इन स्कूलों में आज भी सैकड़ों बच्चे पढ़ रहे हैं. लगभग 20-25 शिक्षक, जिनमें अधिकतर महिलाएं शामिल हैं, इन संस्थानों पर निर्भर हैं. यदि स्कूल बंद होते हैं, तो बच्चों की शिक्षा बाधित होगी और शिक्षकों के सामने रोजगार का संकट खड़ा हो जाएगा.
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सिस्टम पर सवाल
विडंबना यह है कि जिन स्कूलों में भवन, खेल मैदान, शौचालय और स्वच्छ पेयजल जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध हैं, वे कोड के लिए भटक रहे हैं. वहीं कई ऐसे संस्थान भी संचालित हैं जिनके पास कोड तो है, लेकिन बुनियादी सुविधाएं तक नहीं हैं. इससे व्यवस्था की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं.
कोड बहाली के नाम पर भ्रष्टाचार के आरोप
संचालकों ने आरोप लगाया है कि यू-डाइस कोड बहाल करने के नाम पर नगद और उपहार की मांग की जा रही है. उन्होंने सरकार से बंद कोड को तत्काल बहाल करने और नए स्कूलों को कोड देने की मांग की है. साथ ही चेतावनी दी है कि यदि जल्द समाधान नहीं निकला, तो वे सड़क पर उतरकर आंदोलन करेंगे.
शिक्षा व्यवस्था पर सवाल
यह मामला अब केवल स्कूलों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि पूरी शिक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रहा है. अगर समय रहते समाधान नहीं हुआ, तो आने वाली पीढ़ियों का भविष्य प्रभावित होगा. अब जरूरत है कि प्रशासन और शिक्षा विभाग इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए त्वरित कार्रवाई करे.
