कानून की चौखट पर न्याय की कोई ‘एक्सपायरी डेट’ नहीं, नए कानून के तहत अपराधियों पर कसेगा शिकंजा.
Ranchi: अक्सर अपराधी यह मान लेते हैं कि अगर उन्होंने बरसों पहले किसी वारदात को अंजाम दिया और उस वक्त बच निकले, तो समय बीतने के साथ उनका अपराध भी दब जाएगा, लेकिन भारतीय कानून और न्यायपालिका ने यह स्पष्ट कर दिया है कि महिलाओं की गरिमा से खिलवाड़ करने वालों के लिए न्याय की घड़ी कभी नहीं रुकती. चाहे घटना 10 साल पुरानी हो या उससे भी अधिक, यदि साक्ष्य और पीड़िता का साहस अडिग है, तो दोषी को सलाखों के पीछे जाना ही होगा.
देरी से शिकायत करना अब केस की कमजोरी नहीं
पुराने कानूनी ढर्रे में अक्सर यह तर्क दिया जाता था कि घटना के तुरंत बाद प्राथमिकी दर्ज न होने से मामला संदिग्ध हो जाता है, हालांकि, आधुनिक न्यायशास्त्र और सुप्रीम कोर्ट के कई ऐतिहासिक फैसलों ने इस धारणा को पलट दिया है.
अदालतें अब मानती हैं कि भारत जैसे समाज में एक पीड़िता को लोक-लाज, परिवार की प्रतिष्ठा और आरोपी के खौफ से उबरने में लंबा समय लग सकता है. यदि पीड़िता का बयान ठोस है और घटना की पुष्टि करने वाले परिस्थितिजन्य साक्ष्य मौजूद हैं, तो दशकों बाद भी दोषसिद्धि संभव है.
Also Read: मनी लॉन्ड्रिंग केस में मुकेश मित्तल को ED कोर्ट से राहत
भारतीय न्याय संहिता के कड़े प्रावधान
- नए कानूनों के लागू होने के बाद महिलाओं के विरुद्ध अपराधों में सजा की गंभीरता और अधिक स्पष्ट हो गई है. अब छेड़छाड़ और दुष्कर्म के प्रयास जैसे मामलों में.
- BNS की धारा 74: महिला की लज्जा भंग करने के इरादे से हमला या आपराधिक बल का प्रयोग (छेड़छाड़) मामले में एक से पांच साल तक की जेल और जुर्माना.
- BNS की धारा 62: दुष्कर्म का प्रयास इस अपराध के लिए निर्धारित सजा की आधी अवधि (जो उम्रकैद तक की आधी हो सकती है.
अपराधियों के लिए कड़ी चेतावनी
- यह उन लोगों के लिए एक गंभीर संदेश है जो यह सोचते हैं कि वक्त की धूल उनके काले कारनामों को ढंक देगी. रांची समेत पूरे देश की कानूनी व्यवस्था अब इस बात पर जोर दे रही है कि वक्त का बीत जाना बेगुनाही का सबूत नहीं है.
- डिजिटल रिकॉर्ड्स और वैज्ञानिक जांच के दौर में पुराने साक्ष्यों को जुटाना पहले से कहीं अधिक प्रभावी हो गया है.
- पीड़िता अगर आज भी न्याय के लिए सामने आती है, तो उसे वही कानूनी संरक्षण मिलेगा जो घटना के वक्त मिलता.
