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News Wave Special : संसद में हाजिरी के मामले में झारखंड के 4 सांसद बने बाहुबली, दुमका-सिंहभूम के सांसद रहे पीछे

Ranchi : झारखंड का कौन सा सांसद दिल्ली के मंच पर जनता के हक के लिए डटा रहा और किसने अपनी जिम्मेदारी...

संसद

Ranchi : झारखंड का कौन सा सांसद दिल्ली के मंच पर जनता के हक के लिए डटा रहा और किसने अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़कर संसदीय सरेंडर कर दिया, इसका अधिकारिक आंकड़ा चौंकाने वाला है. अधिकतम 31 दिनों के इस सत्र में जहां कुछ सांसदों ने 100% हाजिरी लगाकर कर्तव्यपरायणता की नई मिसाल कायम की है. वहीं कई दिग्गज ऐसे भी रहे, जिन्होंने संसद से दूरी बनाए रखी. अटेंडेंस का यह आंकड़ा सिर्फ एक संख्या नहीं, बल्कि जनता के प्रति जवाबदेही का पैमाना है. जहां एक तरफ 100% हाजिरी लगाने वाले सांसदों ने अपनी वफादारी साबित की है. वहीं लगातार गायब रहने वाले सांसदों को अब अपने क्षेत्र की जनता को यह जवाब देना होगा कि आखिर देश की सबसे बड़ी पंचायत से उनके इस ‘संसदीय सरेंडर’ की वजह क्या थी.

संसद के बाहुबली : जिन्होंने 100% हाजिरी से विरोधियों को धोया

• निशिकांत दुबे (गोड्डा) – 31 दिन (100% अटेंडेंस) : गोड्डा के सांसद निशिकांत दुबे संसदीय बहसों के माहिर खिलाड़ी माने जाते हैं. दिल्ली के मंच पर अपने क्षेत्र की बात रखनी हो या आक्रामक अंदाज में विपक्ष को घेरना हो, वे हर दिन अग्रिम मोर्चे पर डटे नजर आए.
• विद्युत वरण महतो (जमशेदपुर) – 31 दिन (100% अटेंडेंस) : जमशेदपुर की जनता ने जिस भारी भरोसे के साथ इन्हें दिल्ली भेजा था, उस पर यह पूरी तरह खरे उतरे. सत्र के एक-एक पल का उपयोग इन्होंने सदन की कार्यवाही का हिस्सा बनकर किया.
• विष्णु दयाल राम (पलामू) – 31 दिन (100% अटेंडेंस) : राज्य के पूर्व डीजीपी रहे वीडी राम ने संसद के भीतर भी खाकी जैसा कड़ा अनुशासन दिखाया. उम्र और अनुभव के इस पड़ाव पर भी उनकी शत-प्रतिशत मौजूदगी यह बताती है कि वे अपने क्षेत्र के प्रति कितने गंभीर हैं.
• मनीष जायसवाल (हजारीबाग) – 31 दिन (100% अटेंडेंस) : पहली बार लोकसभा की दहलीज लांघने वाले मनीष जायसवाल ने अपने प्रदर्शन से सबको चौंका दिया. सीनियर सांसदों को पछाड़ते हुए उन्होंने शानदार फुल अटेंडेंस मारी और साबित किया कि युवा जोश संसद में बदलाव ला सकता है.

मैदान में डटे रहे : जनता के मुद्दों पर लगातार सजग

• कालीचरण सिंह (चतरा) – 30 दिन : चतरा के नए सांसद कालीचरण सिंह ने सदन की कार्यवाही में लगभग हर दिन अपनी उपस्थिति दर्ज कराई. सिर्फ एक दिन की अनुपस्थिति के साथ वे चतरा की आवाज को दिल्ली में मजबूती देते रहे.
• सुखदेव भगत (लोहरदगा) – 27 दिन : कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सुखदेव भगत ने दिल्ली के दरबार में लोहरदगा की समस्याओं को दबने नहीं दिया. 27 दिनों की सक्रिय उपस्थिति के साथ वे सदन की बहसों में लगातार मुखर दिखे.
• चंद्र प्रकाश चौधरी (गिरिडीह) – 27 दिन : आजसू पार्टी के इकलौते सांसद चंद्र प्रकाश चौधरी ने भी अपनी अटेंडेंस से यह साबित किया, कि वे संसदीय व्यवस्था और जनता के विश्वास को लेकर बेहद गंभीर हैं.
• विजय कुमार हांसदा (राजमहल) – 27 दिन : झामुमो के विजय कुमार हांसदा ने भी विपक्ष की तरफ से मोर्चा संभालते हुए सदन की बहसों और विभिन्न महत्वपूर्ण संसदीय प्रक्रियाओं में अपनी मुस्तैदी दर्ज कराई.

आधे सत्र से भी गायब रहे सांसद

• दुलू महतो (धनबाद) – 23 दिन : धनबाद के कद्दावर और चर्चा में रहने वाले नेता दुलू महतो संसद के कई महत्वपूर्ण और निर्णायक दिनों में पूरी तरह गायब रहे. कोयलांचल की जनता को शायद अपने सांसद से इससे बेहतर उपस्थिति की उम्मीद थी.
• कालीचरण मुंडा (खूंटी) – 23 दिन : खूंटी की जनता ने केंद्रीय मंत्री को हराकर इन्हें भारी उम्मीदों के साथ संसद भेजा था. लेकिन संसद के हाजिरी रजिस्टर में इनकी सुस्ती खूंटी के मतदाताओं के भरोसे पर खरी नहीं उतरती दिख रही है.
• जोबा माझी (सिंहभूम) – 21 दिन : झामुमो की फायरब्रांड महिला नेता और पूर्व मंत्री जोबा माझी करीब एक-तिहाई सत्र के दौरान सदन से नदारद पायी गईं. सिंहभूम के आदिवासियों और मूलवासियों की आवाज उठाने के मामले में उनका यह प्रदर्शन निराश करने वाला है.
• नलिन सोरेन (दुमका) – 13 दिन : दुमका के सांसद नलिन सोरेन का रिकॉर्ड इस पूरे सत्र में सबसे ज्यादा निराशाजनक और शर्मनाक रहा. 31 दिनों के सत्र में आधे से अधिक समय तक संसद की चौखट न लांघना और सिर्फ 13 दिन उपस्थित रहना, उपराजधानी के मतदाताओं के साथ सीधे तौर पर लापरवाही को दर्शाता है.

 

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