Ranchi: झारखंड में इस बार मानसून की आहट नहीं, बल्कि मौत की दस्तक गूंजी है. प्री-मानसून की पहली फुहारों के साथ ही राज्य के अलग-अलग जिलों में कुदरत का ऐसा खौफनाक खेल शुरू हुआ है, जिसने दर्जनों हंसते-खेलते परिवारों को पल भर में उजाड़ कर रख दिया. पिछले महज एक महीने के भीतर झारखंड के विभिन्न जिलों में वज्रपात (आकाशीय बिजली) ने कहर बरपाते हुए 20 लोगों की जिंदगी छीन ली.
गोड्डा-कोडरमा सबसे प्रभावित
आसमानी आपदा ने सबसे गहरा जख्म गोड्डा और कोडरमा जिलों को दिया है. जून के शुरुआती 10 दिनों में ही अकेले गोड्डा में आकाशीय बिजली ने चार लोगों की जान ले ली. वहीं, कोडरमा के सतगावां में कुदरत का सबसे क्रूर चेहरा देखने को मिला, जहां नन्दुआडीह गांव में बिजली गिरने से एक ही परिवार के तीन लोगों (मां, बेटा और गोतनी) की मौके पर ही मौत हो गई. संताल परगना के पाकुड़ और दुमका में भी इस आसमानी बिजली ने मासूम बच्चियों समेत तीन लोगों की जान ले ली.
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लगातार जा रही जानें
• पलामू, चतरा, लातेहार से लेकर रांची, गढ़वा और धनबाद-बोकारो तक मौत का यह सिलसिला बदस्तूर जारी है.
• रांची के इटकी में आम चुनने गई 12 वर्ष की एक मासूम बच्ची पर बिजली काल बनकर गिरी.
• पोटका (पूर्वी सिंहभूम) में खेत के पास खड़ी 23 वर्ष की एक नवविवाहिता को आसमानी कहर ने संभलने का मौका तक नहीं दिया.
• गढ़वा और चतरा में मवेशी चराने गए तथा पेड़ों के नीचे शरण लेने वाले ग्रामीण वज्रपात का शिकार बने.
जागरूकता की कमी
मौसम विभाग लगातार अलर्ट जारी कर रहा है. ‘दामिनी ऐप’ भी बिजली गिरने की चेतावनी दे रहा है, लेकिन जागरूकता के अभाव में लोगों की जानें जा रही हैं. लोग आज भी कड़कते मौसम में पेड़ों के नीचे छिपने की आत्मघाती गलती कर रहे हैं. यदि अब भी झारखंड का ग्रामीण इलाका और प्रशासन युद्धस्तर पर मुस्तैद नहीं हुआ, तो मानसून की वास्तविक दस्तक के साथ यह मौत का आंकड़ा और बढ़ सकता है.
लाइटनिंग हॉटस्पॉट बना झारखंड
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग और क्लाइमेट रेजिलिएंट ऑब्जर्विंग सिस्टम्स प्रमोशन काउंसिल की वार्षिक रिपोर्ट के चौंकाने वाले आंकड़े बताते हैं कि झारखंड देश के सबसे खतरनाक लाइटनिंग हॉटस्पॉट के रूप में उभर चुका है. राज्य की धरती पर हर साल औसतन चार से पांच लाख बार आकाशीय बिजली गिरती है.
ये जिले डेंजर जोन में
झारखंड के कई जिलों में वज्रपात की सघनता रेड लाइन पार कर चुकी है, जिनमें चतरा, पलामू, हजारीबाग और लोहरदगा शामिल हैं. इन जिलों के आसमान में खतरा लगातार बना रहता है. विशेषज्ञों के मुताबिक, प्री-मानसून और मानसून के आगमन का समय, यानी जून और जुलाई, झारखंड के लिए सबसे अधिक घातक साबित होता है.
क्यों गिरती है ज्यादा बिजली?
• खनिजों की प्रचुरता (मैग्नेटिक अट्रैक्शन): छोटानागपुर का पठारी क्षेत्र समुद्र तल से काफी ऊंचाई पर स्थित है. झारखंड की मिट्टी में लौह अयस्क सहित कई धात्विक खनिजों का अकूत भंडार है. मिट्टी में मौजूद ये खनिज तत्व आसमान में बनने वाले विद्युत आवेश को चुंबक की तरह तेजी से अपनी ओर आकर्षित करते हैं.
• जंगलों का विनाश और कंक्रीट का विस्तार: पहले ऊंचे पेड़ आकाशीय बिजली को सोखकर सीधे जमीन के भीतर पहुंचा देते थे, जिससे इंसानी बस्तियां सुरक्षित रहती थीं. लेकिन अब ऊंचे पेड़ों की संख्या घटने से बिजली सीधे इंसानों और खुले में चर रहे मवेशियों पर गिर रही है.



