Ranchi : झारखंड में आदिवासियों और पारंपरिक वनवासियों को उनके जल-जंगल-जमीन का मालिकाना हक देने की रफ्तार काफी धीमी हो चुकी है. वन प्रमंडलों से आए ताजा आंकड़े के अनुसार वनाधिकार अधिनियम के तहत मिलने वाले अधिकार अब केवल सरकारी लालफीताशाही और फाइलों के मकड़जाल में उलझकर रह गए हैं. सूबे के विभिन्न क्षेत्रों से हजारों की संख्या में आए आवेदनों के निस्तारण और उनके वास्तविक रकबा आवंटन में जो भारी विसंगतियां सामने आई हैं, वे बेहद चौंकाने वाली हैं.
रांची रीजन : दावों की भारी भीड़, लेकिन अधिकार के नाम पर महज औपचारिकता
रांची क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले सिमडेगा, गुमला, रांची, खूंटी और लोहरदगा जैसे जिलों में व्यक्तिगत और सामुदायिक वनाधिकारों की स्थिति बेहद निराशाजनक है. सिमडेगा में व्यक्तिगत अधिकारों के लिए 9,681 आवेदकों ने अपनी दावेदारी पेश की थी, लेकिन उन्हें महज 4,222.699 एकड़ क्षेत्र में ही समेट दिया गया. हालांकि, यहां सामुदायिक अधिकारों के तहत 153 आवेदनों के बदले 33,620.097 एकड़ भूमि का निस्तारण दिखाया गया है. जो कागजों पर तो बड़ा दिखता है, लेकिन धरातल पर इसकी उपयोगिता पर सवाल हैं. गुमला की स्थिति और भी बदतर है. जहां 1,925 व्यक्तिगत आवेदनों के मुकाबले सिर्फ 637.820 एकड़ जमीन ही निस्तारित की जा सकी है. सूबे की राजधानी रांची में 1,501 व्यक्तिगत आवेदकों को सिर्फ 3,523.924 एकड़ जमीन से संतोष करना पड़ा. खूंटी में 914 व्यक्तिगत आवेदनों पर 502.470 एकड़ जमीन ही दी गई. लोहरदगा में भी 861 व्यक्तिगत आवेदकों के हिस्से सिर्फ 487.87 एकड़ भूमि आई है. पूरे रांची रीजन में कुल 15,432 आवेदनों का निस्तारण कर 1,14,910.376 एकड़ का दावा तो किया गया है. व्यक्तिगत तौर पर आदिवासियों के हाथ खाली ही रहे हैं.
जमशेदपुर रीजन : औद्योगिक बेल्ट में वनाधिकारों पर सरकारी कैंची
कोल्हान और जमशेदपुर जैसी समृद्ध वन पट्टियों वाले इस रीजन में वनाधिकारों को लेकर सरकारी तंत्र का रवैया बेहद सुस्त रहा है. जमशेदपुर प्रमंडल में 3,842 व्यक्तिगत आवेदकों में से केवल 3,415 आवेदनों को हरी झंडी मिली. जिसके तहत मात्र 942.542 एकड़ जमीन आवंटित की गई. सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि यहां 21 सामुदायिक आवेदनों के बदले महज 17.9075 एकड़ का नगण्य रकबा दिया गया. पोड़ाहाट में 2,778 व्यक्तिगत दावों पर 11,919.02 एकड़ का निस्तारण थोड़ा बेहतर दिखता है, लेकिन सरायकेला में फिर वही कहानी दोहराई गई.जहां 2,478 व्यक्तिगत आवेदनों के बदले सिर्फ 601.710 एकड़ जमीन आवंटित हुई. कोलहान प्रमंडल में 1,503 व्यक्तिगत आवेदकों को 6,557.220 एकड़ जमीन तो मिली, पर चाईबासा में 976 आवेदकों को महज 1,344.050 एकड़ से ही काम चलाना पड़ा. सारंडा जैसे घने वन क्षेत्र में व्यक्तिगत दावों का आंकड़ा गायब है और वहां केवल 607 सामुदायिक आवेदनों के तहत 315.460 एकड़ का निस्तारण दिखाया गया है.
पलामू रीजन : शून्य आवंटन और कागजी खानापूर्ति का गवाह
मेदिनीनगर प्रमंडल में 5,602 व्यक्तिगत आवेदकों का प्रारंभिक रकबा शून्य दिखाया गया है, जबकि बाद में निस्तारण के नाम पर 5,228 आवेदकों को 4,628.480 एकड़ जमीन देने का दावा किया गया है. लातेहार में 2,368 आवेदकों के मुकाबले 1,814 व्यक्तिगत दावों को निपटाते हुए 2,727.950 एकड़ भूमि दी गई. गढ़वा उत्तरी में 977 आवेदकों को 957.71 एकड़ जमीन आवंटित की गई, लेकिन गढ़वा दक्षिणी की तस्वीर बेहद डरावनी है. यहां 517 व्यक्तिगत आवेदकों का प्रारंभिक रकबा शून्य था और निस्तारण के वक्त भी महज 247 आवेदकों को 293.480 एकड़ जमीन ही नसीब हो सकी. पलामू प्रमंडल में कुल मिलाकर दावों को खारिज करने और बेहद कम जमीन देकर फाइलों को बंद करने की होड़ मची हुई है.
दुमका रीजन : संताल परगना में अधिकारों की कछुआ चाल
संताल परगना के दुमका क्षेत्र में भी वनाधिकारों की स्थिति डांवाडोल ही है. दुमका प्रमंडल में 4,922 व्यक्तिगत आवेदकों को 5,730.1860 एकड़ भूमि का निस्तारण किया गया. वहीं, साहेबगंज में 1,475 आवेदकों में से 1,470 को 2,049.58 एकड़ जमीन दी गई. गोड्डा में 1,109 व्यक्तिगत आवेदकों के दावों के मुकाबले सिर्फ 1,090 आवेदनों को मंजूरी देकर 224.66 एकड़ का बेहद छोटा टुकड़ा थमा दिया गया. जबकि यहां सामुदायिक अधिकारों के तहत 259 आवेदनों को 22,303.41 एकड़ जमीन आवंटित की गई है. जामताड़ा में 1,223 आवेदकों के हिस्से सिर्फ 789.215 एकड़ जमीन आई. पाकुड़ में 1,550 आवेदकों में से केवल 985 को ही वनाधिकार मिल सका. जिसके तहत 691.520 एकड़ जमीन का निस्तारण हुआ. देवघर में 946 आवेदकों को 676.570 एकड़ जमीन ही मिल पाई.
बोकारो रीजन : कोयलांचल में आदिवासियों के अधिकारों का हनन
बोकारो और गिरिडीह जैसे औद्योगिक और कोयला खनन वाले क्षेत्रों में वनाधिकारों की स्थिति सबसे चिंताजनक है. गिरिडीह पूर्वी में 6,220 व्यक्तिगत आवेदकों को 12,646.170 एकड़ जमीन आवंटित की गई, लेकिन यहां सामुदायिक अधिकारों का खाता तक नहीं खुला, जो शून्य पर अटका हुआ है. धनबाद में 1,195 व्यक्तिगत आवेदकों को 1,988.590 एकड़ जमीन दी गई. बोकारो प्रमंडल में 986 व्यक्तिगत आवेदकों का शुरुआती आवंटन रकबा शून्य दर्ज था. जिसे बाद में सुधार कर 975 आवेदकों को 566.630 एकड़ का बेहद मामूली हिस्सा दिया गया. रामगढ़ में भी यही खेल हुआ, जहां 1,645 आवेदकों की शुरुआत शून्य रकबे से हुई और निस्तारण के नाम पर 770 आवेदकों को सिर्फ 222.150 एकड़ जमीन मिली. गिरिडीह पश्चिमी में 461 आवेदकों में से 460 को 443.396 एकड़ भूमि का निस्तारण किया गया.
हजारीबाग रीजन : शून्य की मार और प्रशासनिक उदासीनता की पराकाष्ठा
हजारीबाग पूर्वी (2,638 आवेदक), हजारीबाग पश्चिमी (1,851 आवेदक), चतरा दक्षिणी (1,583 आवेदक), कोडरमा (820 आवेदक) और चतरा उत्तरी (162 आवेदक) – इन सभी प्रमंडलों में कुल आवेदकों का प्रारंभिक रकबा सरकारी रिकॉर्ड में शून्य (0) दर्ज है. निस्तारण के नाम पर हजारीबाग पूर्वी में 1,079 व्यक्तिगत आवेदकों को 933.218 एकड़ और हजारीबाग पश्चिमी में 1,718 आवेदकों को 1,289.470 एकड़ जमीन दी गई. चतरा दक्षिणी में महज 352 आवेदकों को 880.263 एकड़, कोडरमा में 313 आवेदकों को 100.760 एकड़ और चतरा उत्तरी में 161 आवेदकों को 70.758 एकड़ जमीन देकर इतिश्री कर ली गई.
वाइल्डलाइफ रीजन : अभयारण्यों के नाम पर आदिवासियों की बेदखली तेज
पीटीआर (पलामू टाइगर रिजर्व) दक्षिणी में 1,159 व्यक्तिगत आवेदकों की शुरुआती भूमि शून्य थी. जिसे बाद में 1,070 आवेदकों के लिए 1,794.480 एकड़ दिखाया गया. पीटीआर उत्तरी में 734 आवेदकों के मुकाबले महज 441 को 732.230 एकड़ जमीन मिल पाई. गज परियोजना जमशेदपुर में 159 आवेदकों को सिर्फ 63.160 एकड़ की मामूली जमीन दी गई. हजारीबाग वन्यप्राणी क्षेत्र में 169 आवेदकों में से 159 को सिर्फ 65.720 एकड़ और रांची वन्यप्राणी क्षेत्र में 157 व्यक्तिगत आवेदकों की शुरुआत शून्य से हुई. जिन्हें बाद में 90 आवेदकों के रूप में 103.461 एकड़ जमीन दी गई.


