Ravi Bharti
रांची: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की सरगर्मी के बीच झारखंड की राजनीति भी गरमा गई है. हेमंत सोरेन और कल्पना सोरेन ने ममता बनर्जी के समर्थन में प्रचार करने का फैसला लिया है. 18 से 20 अप्रैल के बीच पुरुलिया और सीमावर्ती इलाकों में झामुमो के प्रचार अभियान ने सियासी हलचल बढ़ा दी है. इस कदम को कांग्रेस के लिए सीधी चुनौती के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि झारखंड में दोनों दल गठबंधन में हैं, लेकिन बंगाल में अलग राह अपनाते नजर आ रहे हैं.
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‘राज्य तक सीमित गठबंधन’ की दलील, पर बढ़ती असहजता
झामुमो और कांग्रेस दोनों का कहना है कि उनका गठबंधन सिर्फ झारखंड तक सीमित है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषक इसे रणनीतिक कदम मान रहे हैं. माना जा रहा है कि झामुमो राष्ट्रीय स्तर पर अपनी अलग पहचान मजबूत करना चाहता है और क्षेत्रीय दलों के साथ तालमेल बढ़ा रहा है. वहीं कांग्रेस के भीतर इस फैसले को लेकर असहजता भी दिख रही है, हालांकि सत्ता संतुलन बनाए रखने के कारण वह खुलकर विरोध नहीं कर पा रही है.
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असम और बिहार की सियासत का असर, पुरानी नाराजगी का संकेत
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि झामुमो का यह रुख असम और बिहार के चुनावी अनुभवों से जुड़ा है, जहां उसे अपेक्षित महत्व नहीं मिला था. ऐसे में अब पार्टी खुद को स्वतंत्र ताकत के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रही है. यह कदम कांग्रेस के साथ रिश्तों में खटास का संकेत भी माना जा रहा है, भले ही दोनों दल सार्वजनिक रूप से इसे सामान्य बता रहे हों.
आदिवासी सीटों पर असर, चुनावी समीकरण बदलने की संभावना
बंगाल के चुनावी गणित में आदिवासी बहुल सीटें अहम भूमिका निभाती हैं. पुरुलिया और आसपास के इलाकों में झामुमो का प्रभाव माना जाता है. ऐसे में हेमंत सोरेन का ममता बनर्जी के पक्ष में प्रचार करना त्रिकोणीय मुकाबले में कांग्रेस-वाम गठबंधन के वोट बैंक को प्रभावित कर सकता है. इससे चुनावी समीकरण बदलने की पूरी संभावना बन गई है.
