Ranchi : माकपा ने कहा है कि झारखंड के विकास को लेकर एक तरफ जहां बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, वहीं जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है. राज्य के सांसदों द्वारा विकास कार्यों के लिए मिलने वाली ‘सांसद निधि’ का इस्तेमाल न हो पाना और विश्वविद्यालयों में पदों की कटौती जैसे मुद्दों ने प्रदेश की सियासत और प्रशासनिक कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
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140 करोड़ आवंटित, खर्च हुए मात्र 14 करोड़
माकपा मे कहा है कि चौंकाने वाले आंकड़ों के अनुसार, झारखंड के 14 सांसदों को कुल 140.87 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे. विडंबना यह है कि इसमें से अब तक केवल 10 प्रतिशत (लगभग 14 करोड़ रुपये) ही खर्च किए जा सके हैं.
जवाबदेही की कमी: योजनाओं को प्रशासनिक स्वीकृति मिलने के बावजूद काम का अधूरा रहना यह दर्शाता है कि मॉनिटरिंग और जिम्मेदारी तय करने में भारी चूक हो रही है.
कागजी खानापूर्ति: ऐसा प्रतीत होता है कि प्रशासन और जनप्रतिनिधि केवल कागजी प्रक्रियाओं में उलझे हैं, जिसका सीधा नुकसान राज्य की जनता और स्थानीय विकास को हो रहा है.

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विवि में आउटसोर्सिंग
विश्वविद्यालयों में गैर-शैक्षणिक पदों को खत्म कर आउटसोर्सिंग व्यवस्था लागू करने के निर्णय पर माकपा (सीपीएम) ने कड़ा विरोध जताया है. सरकार ने पुनर्गठन के नाम पर रांची विश्वविद्यालय मुख्यालय सहित 14 अंगीभूत कॉलेजों और 10 डिग्री कॉलेजों में 1851 गैर-शैक्षणिक पद समाप्त कर दिए हैं. सीपीएम के राज्य सचिवमंडल का कहना है कि चतुर्थ वर्ग के पदों को खत्म करना कर्मियों की सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा को खतरे में डालना है. पहले से ही सैकड़ों कर्मचारी आउटसोर्सिंग पर काम कर रहे हैं और इस नए फैसले से उनकी स्थिति और भी दयनीय हो जाएगी.
