नये लेबर कोड के प्रावधानों से ट्रेड यूनियनों में खलबली, 30 जून 2026 को समाप्त हो रही है JBCCI-11 की अवधि
Dhanbad : देश के कोयला श्रमिकों के लिए आने वाला समय बड़े बदलावों का संकेत दे रहा है. कोयला उद्योग में वेतन, बोनस और अन्य सुविधाओं के निर्धारण के लिए वर्षों से चली आ रही जेबीसीसीआई (JBCCI) व्यवस्था पर अब संकट के बादल मंडराने लगे हैं. चर्चा है कि केंद्र सरकार के नये लेबर कोड के लागू होने के बाद अब इसकी जगह ‘वार्ताकार परिषद’ (Negotiating Council) ले सकती है.
20% सदस्यता की अनिवार्य शर्त से बढ़ी चिंता
नये लेबर कोड के नियमों के अनुसार, वार्ताकार परिषद में केवल उन्हीं ट्रेड यूनियनों को प्रतिनिधित्व मिलेगा जिनकी सदस्यता कुल कार्यरत कामगारों का कम से कम 20 प्रतिशत होगी. वर्तमान में कोल इंडिया में इंटक, ऐटक, सीटू, बीएमएस और एक्टू जैसी पांच केंद्रीय यूनियनें सक्रिय हैं. परिषद के नए नियमों के कारण कई यूनियनों के अस्तित्व और उनकी मोलभाव करने की शक्ति पर सवाल खड़े हो रहे हैं.
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औद्योगिक संबंधों पर पड़ सकता है बुरा असर
ट्रेड यूनियन नेताओं का मानना है कि वार्ताकार परिषद के आने से दशकों पुराने इंडस्ट्रियल रिलेशन (IR) प्रभावित होंगे. एक्टू के वरिष्ठ नेता लखन लाल महतो ने स्पष्ट किया, “अगर कोयला मजदूरों के बोनस और वेतन समझौते में कोई भी बाधा आती है, तो उसे स्वीकार नहीं किया जाएगा. हम लेबर कोड का विरोध जारी रखेंगे.”
कोल इंडिया को ‘पंगु’ बनाने का आरोप
इंटक के महामंत्री ए.के. झा ने सरकार की नीतियों पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि सरकार कोल इंडिया के कार्यों में निजी कंपनियों को शामिल कर सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को कमजोर कर रही है.
निजीकरण का प्रभाव: निजी कंपनियों को कोयला खनन और बिक्री का अधिकार देने से बीसीसीएल सहित अन्य सरकारी कंपनियों की आर्थिक स्थिति खराब हो रही है.
एक्ट का उल्लंघन: कोल नेशनलाइजेशन एक्ट के तहत कोयला बेचने का एकाधिकार कोल इंडिया के पास था, जिसे अब निजी मुनाफे के लिए बदला जा रहा है.
मजदूरों का नुकसान: जेबीसीसीआई के भंग होने से श्रमिकों को लाभ के बजाय घाटा होने की पूरी संभावना है.
