Seraikela: पूर्वी सिंहभूम जिले के बोड़ाम प्रखंड अंतर्गत बोटा पंचायत के बोटा पहाड़िया टोला, बांदरजलकोचा में दलमा वन्य प्राणी आश्रयणी क्षेत्र में वन विभाग द्वारा किए जा रहे बांस रोपण का स्थानीय आदिम जनजाति पहाड़िया समुदाय ने विरोध किया है. ग्रामीणों ने बांस के बजाय फलदार और बहुउपयोगी पौधे लगाने की मांग की है. उनका कहना है कि इससे उनकी आजीविका मजबूत होगी और आने वाली पीढ़ियों को भी लाभ मिलेगा.
ग्रामीणों ने कहा- बांस से नहीं चलेगा गुजारा
दलमा वन्य प्राणी आश्रयणी के तराई क्षेत्र में बसे इस गांव में करीब 19 परिवार और लगभग 80 लोग रहते हैं. ग्रामीणों का कहना है कि बांस रोपण से उन्हें कोई प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ नहीं मिलेगा. उनका कहना है कि बांस लगाने से न तो परिवारों की आय बढ़ेगी और न ही बच्चों के पोषण की समस्या दूर होगी.ग्रामीणों ने कहा, “हमें बांस नहीं चाहिए. बांस लगाने से हमारा पेट नहीं भरेगा. गांव में ऐसे पेड़ लगाए जाएं जिनसे भविष्य में रोजगार और पोषण दोनों मिल सकें.”
फलदार और बहुउपयोगी पौधे लगाने की मांग
ग्रामीणों ने वन विभाग से गांव में आम, जामुन, अमरूद, काजू, कुसुम, कदम, आंवला, लीची, संतरा और नाशपाती जैसे फलदार एवं बहुउपयोगी पौधे लगाने की मांग की है. उनका कहना है कि इन पेड़ों से पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ ग्रामीणों को अतिरिक्त आय और बच्चों को पौष्टिक फल भी मिलेंगे.
आदिम जनजाति विकास समिति ने किया समर्थन
विरोध प्रदर्शन के दौरान आदिम जनजाति विकास समिति के प्रतिनिधि भी बांदरजलकोचा पहुंचे. समिति ने ग्रामीणों की मांग का समर्थन करते हुए कहा कि किसी भी सरकारी योजना को लागू करने से पहले स्थानीय समुदाय की जरूरतों और उनकी राय को प्राथमिकता दी जानी चाहिए. तभी योजनाओं का वास्तविक लाभ लोगों तक पहुंच सकेगा.
वन विभाग और प्रशासन से योजना बदलने की मांग
मौके पर सुकलाल पहाड़िया, गुरूचरण कर्मकार, भूषण पहाड़िया, मंगल पहाड़िया, छतर पहाड़िया सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण मौजूद थे. सभी ने वन विभाग और जिला प्रशासन से बांस रोपण की योजना पर पुनर्विचार करते हुए स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप फलदार एवं बहुउपयोगी पौधे लगाने की मांग की.
‘विकास ऐसा हो जो जीवन बदले’
ग्रामीण नेताओं ने कहा कि आदिम जनजाति समुदाय लंबे समय से विकास की मुख्यधारा से दूर रहा है. ऐसे में सरकार को ऐसी योजनाएं लागू करनी चाहिए, जिनसे लोगों की आय बढ़े और जीवन स्तर में सुधार आए. उन्होंने स्पष्ट कहा कि वे पर्यावरण संरक्षण के विरोधी नहीं हैं, बल्कि ऐसा विकास चाहते हैं जो सीधे उनके जीवन और आजीविका से जुड़ा हो. उनका मानना है कि फलदार वृक्ष लगाने से पर्यावरण भी सुरक्षित रहेगा और आदिम जनजाति समुदाय का भविष्य भी अधिक समृद्ध होगा.
