JMM के कद्दावर नेता निर्मल महतो के हत्यारे नरेंद्र सिंह की समय पूर्व रिहाई पर विचार करे राज्य सजा समीक्षा बोर्ड, 29 साल से है जेल में बंद -हाईकोर्ट 

विनीत आभा उपाध्याय Ranchi: झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य सजा समीक्षा बोर्ड के उस फैसले को खारिज कर दिया है जिसमें उम्रकैद की...

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विनीत आभा उपाध्याय 

Ranchi: झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य सजा समीक्षा बोर्ड के उस फैसले को खारिज कर दिया है जिसमें उम्रकैद की सजा काट रहे नरेंद्र सिंह उर्फ पंडित की समय-पूर्व रिहाई की याचिका को नामंजूर कर दिया गया था. नरेंद्र सिंह उर्फ़ नरेंद्र पंडित जेएमएम के बड़े नेता और सांसद रहे निर्मल महतो की हत्या के जुर्म में सजा काट रहा है. अदालत ने बोर्ड को निर्देश दिया है कि वह राज्य की नीति के तहत तीन महीने के भीतर इस मामले पर नए सिरे से विचार करे.

हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए दिया निर्देश

यह आदेश झारखंड हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस रोंगोन मुखोपाध्याय की कोर्ट ने नरेंद्र सिंह की याचिका को स्वीकार करते हुए दिया है.याचिकाकर्ता ने बोर्ड के 28 मार्च 2025 के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें उसकी रिहाई की अर्जी खारिज कर दी गई थी. 

29 साल से जेल में बंद है नरेंद्र सिंह

नरेंद्र सिंह हत्या और आर्म्स एक्ट की धारा के तहत दोषी करार दिया गया है और वास्तविक रूप से लगभग 23 वर्ष और छूट मिलाकर कुल 29 वर्ष की जेल काट चुका है.याचिकाकर्ता की सजा को साल 2017 में झारखंड हाईकोर्ट ने बरकरार रखा था. 

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सुप्रीम कोर्ट भी दे चुका था विचार करने का निर्देश

इसके बाद जुलाई 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने उसकी याचिका खारिज करते हुए राज्य सरकार को दो महीने के भीतर छूट नीति के तहत विचार करने का निर्देश दिया था. लेकिन सजा समीक्षा बोर्ड ने उसकी अर्जी यह कहते हुए खारिज कर दी कि कैदी ने राजनीतिक कारणों से एक लोकप्रिय जन प्रतिनिधि की योजनाबद्ध तरीके से हत्या की थी और उसे रिहा करने से समाज में गलत संदेश जाएगा. सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि बोर्ड ने प्रोबेशन ऑफिसर की अनुकूल रिपोर्ट की अनदेखी की और 26 मई 2011 की सरकारी नीति के अनिवार्य मानदंडों पर ध्यान नहीं दिया. 

हाईकोर्ट ने बोर्ड की प्रक्रिया पर जताई आपत्ति 

अदालत ने स्पष्ट किया कि इस नीति के तहत बोर्ड को कई बिंदुओं पर विचार करना होता है जिसमें यह देखना महत्वपूर्ण है कि क्या अपराध का समाज पर व्यापक प्रभाव पड़ा या यह व्यक्तिगत प्रकृति का था? कैदी द्वारा भविष्य में अपराध करने की कितनी आशंका है? क्या दोबारा अपराध करने की संभावना अब समाप्त हो चुकी है? क्या कैदी को आगे भी जेल में रखना जरूरी है? कैदी की सामाजिक और राजनीतिक स्थिति क्या है? जस्टिस मुखोपाध्याय ने कहा कि बोर्ड ने कैदी की लंबी सजा और अन्य परिस्थितियों को किनारे रखकर केवल हत्या के राजनीतिक पहलू को ही अत्यधिक महत्व दिया जो कि अनुचित है. हाईकोर्ट ने बोर्ड के पुराने आदेश को रद्द करते हुए मामले को वापस भेज दिया है और यह निर्देश दिया है कि 2011 की रिहाई नीति के दिशा-निर्देशों के तहत तीन महीने के भीतर इस पर अंतिम फैसला लिया जाए.

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