HAZARIBAGH: वैसे तो सभी पर्व-त्योहार आस्था और विश्वास का प्रतीक होते हैं, लेकिन झारखंड के मूलवासी जाति और जनजातीय बाहुल्य क्षेत्रों में मनाया जाने वाला मंडा पर्व आस्था की एक ऐसी अविरल धारा प्रस्तुत करता है, जो हर किसी को चौंका देता है. इस पर्व में भोक्ता (व्रती) फुलखुंदी यानी दहकते अंगारों पर ऐसे चलते हैं, मानो वह अंगारे नहीं बल्कि फूलों की सेज हो.
अपने शरीर में लोहे के बड़े-बड़े कील चुभोकर वे हवा में ऐसे झूलते हैं, जैसे सावन के महीने में झूले का आनंद ले रहे हों. इस पूजा में मुख्य रूप से भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठिन तपस्या की जाती है.
वैशाख माह में मनाया जाता है पर्व
यह पर्व वैशाख माह के अक्षय तृतीया से आरंभ होता है. फुलखुंदी के नियम से कुछ दिन पहले ही भोक्ता भगवान शिव की पूजा में जुट जाते हैं. यह पर्व बोकारो, धनबाद, गिरिडीह, रामगढ़, हजारीबाग, रांची, जमशेदपुर, सरायकेला-खरसावां और खूंटी समेत कई जिलों में बड़े ही उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है.
मंडा पर्व को अलग-अलग क्षेत्रों में भोक्ता पर्व, चड़क पूजा, चैत पर्व और बनस पर्व जैसे विभिन्न नामों से भी जाना जाता है. यह पर्व भक्ति, आस्था और हैरतअंगेज करतबों का अनोखा संगम है, जिसमें झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा की पौराणिक संस्कृति और परंपरा की झलक देखने को मिलती है.
कठिन तपस्या और अनोखी परंपरा
इस पर्व में घर का एक सदस्य व्रती होता है, जिसे भगता या भोक्ता कहा जाता है. उसकी मां या बहन उपवास रखती है, जिसे सोखताइन कहा जाता है. त्योहार के दौरान तीन दिनों तक उपवास रखा जाता है और चौथे दिन फुलखुंदी की रस्म होती है.
इस दिन भोक्ता शष्ठांग दंड, मशाल जुलूस, तपती दोपहर में आग पर चलना और अपने शरीर के विभिन्न अंगों—जैसे पीठ, पैर और जीभ में लोहे के कील चुभाकर डांग या खुट्टा की सहायता से लगभग 35 से 40 फीट ऊंचाई पर झूलते हुए नृत्य करते हैं. यह दृश्य रोंगटे खड़े कर देने वाला होता है, जिसे देखने के लिए हजारों-लाखों लोग जुटते हैं.
परंपरा के पीछे आस्था और मान्यता
जहां आधुनिक युग में एक सूई चुभने पर भी लोग टेटनस का इंजेक्शन लेते हैं, वहीं इस पर्व में शामिल लोग वर्षों से इन कठिन परंपराओं का पालन करते आ रहे हैं और उन्हें न तो बीमारी होती है और न ही दर्द का एहसास.
लोगों का मानना है कि यह परंपरा अच्छी बारिश, फसल की उपज और सुख-समृद्धि के लिए निभाई जाती है. व्रत के दौरान पूरी सादगी और सात्विकता के साथ कई कठोर नियमों का पालन करना होता है.
चार दिनों तक चलता है अनुष्ठान
पहले दिन पूजा-अर्चना होती है. दूसरे दिन गाजन, मशाल प्रदर्शन, दंडी यात्रा और पारंपरिक ढोल-नगाड़े, मांदर की थाप पर नृत्य और झूमर गान होता है. तीसरे दिन मंडा खुट्टा प्रदर्शन के जरिए अद्भुत भक्ति का प्रदर्शन किया जाता है. अंतिम दिन स्नान, गंगाजल से शुद्धिकरण और छऊ नृत्य के साथ पर्व का समापन होता है.
आस्था की मिसाल बने श्रद्धालु
बोकारो के चंदनकियारी प्रखंड निवासी अरुण राय बताते हैं कि वे पिछले 60 वर्षों से बनस पर कील भोंककर चढ़ते आ रहे हैं और आज तक उन्हें कोई परेशानी नहीं हुई. वहीं अनिल महतो कहते हैं कि वे करीब 30 वर्षों से इस पर्व के दौरान लोगों के शरीर में कील चुभाने का कार्य कर रहे हैं.
पर्व के दौरान वातावरण “ॐ नमः शिवाय” और “शिव शिवाय मनि पार्वती हीं” जैसे जयकारों से गूंज उठता है. इस अवसर पर आम, तरबूज, पलाश के पत्ते, गुलैची के फूल, नए गुड़ और चना का सेवन भी परंपरा का हिस्सा होता है.
सांस्कृतिक रंग और मेले का आयोजन
इस दौरान छऊ नृत्य, झूमर, बुलबुली नृत्य, बाऊल संगीत, नाटक और आर्केस्ट्रा का आयोजन होता है. ग्रामीण क्षेत्रों में भव्य मेलों का भी आयोजन होता है, जहां लोग एक-दूसरे से मिलकर खुशियां बांटते हैं.
