Akshay Kumar Jha
Ranchi: बीजेपी की हालत झारखंड में किसी से छिपी नहीं है. फिलहाल इस पार्टी को झारखंड में स्क्रीन की पार्टी घोषित कर दिया गया है. मतलब इस पार्टी के लोग फील्ड पर कम और स्क्रीन पर ज्यादा दिखते हैं. करने को तो रोजाना एक बड़े पदाधिकारी से प्रेस कॉन्फेंस आयोजित कराया जाता है, लेकिन इसका असर कितना होता है, उससे किसी को फर्क नहीं पड़ता. हर बड़े मुद्दे पर पार्टी के कार्यकर्ता अपने कार्यालय में ही दिखते हैं. जब इस मामले पर बीजेपी के कुछ लोगों से बात की गयी तो, उन्होंने कहा कि पार्टी की ऐसी हालत के जिम्मेदार और कोई नहीं बल्कि पार्टी के पदाधिकारी लोग ही हैं. कुछ ने यह दावा किया कि जिस पार्टी के कोर कमेटी में 80 फीसदी हारा हुआ पदाधिकारी बैठा है, उस पार्टी से उम्मीद ही क्या कर सकते हैं.
जानिए हारी हुई पार्टी की फेहरिस्त
अध्यक्षः आदित्य साहूः फिलहाल पार्टी की कमान आदित्य साहू के हाथों में है. आदित्य साहू राज्यसभा के सांसद हैं. सालों पार्टी में बिताया है, लेकिन चुनाव एक भी नहीं जीत पाए हैं. पार्टी में इनकी पकड़ जरूर है. लेकिन कार्यकर्ताओं के फेवरेट लोगों में से नहीं है. आदित्य साहू ने बस एक बार चुनाव लड़ा है और जबरदस्त तरीके से मुंह की खाए हैं. 2009 में इन्होंने सिल्ली से चुनाव लड़ा और मात्र 2200 वोट लाने में सफल हुए थे. इनकी अग्नी परीक्षा घाटसिला चुनाव में हुई. लेकिन पार्टी को जीत नहीं दिला सके. उसी वक्त इनकी दक्षता को लोगों ने समझ लिया था. ऐसे में इनकी जमीनी पकड़ को समझा जा सकता है.
उपाध्यक्षः नीलकंठ सिंह मुंडाः एक दिग्गज नेता जरूर हैं. झारखंड सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं. लेकिन 2024 के विधानसभा चुनाव में खूंटी से हार गए.
उपाध्यक्षः भानूप्रताप शाहीः सोशल मीडिया पर हमेशा दिखने वाले भानूप्रताप शाही भले ही अपने बोलने के तरीके से जाने जाते हों. लेकिन 2024 के विधानसभा चुनाव में वो हार गए. जबकि इनके चुनाव प्रचार के लिए देश का सबसे बड़ा स्टार प्रचारक इनके विधानसभा क्षेत्र पहुंचे थे. खूद यूपी के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने इनका प्रचार किया था.
महामंत्रीः अमर बाउरीः झारखंड सरकार के पूर्व मंत्री अमर बाउरी संगठन में महामंत्री हैं, और यह भी एक हारे हुए उम्मीदवार हैं. 2024 के विधानसभा चुनाव में वो चंदनकियारी से तीसरे नंबर पर थे.
महामंत्रीः मनोज सिंहः संगठन में भले ही मनोज सिंह महामंत्री के पद पर हैं. लेकिन इन्होंने कभी चुनाव नहीं जीता. 2014 के विधानसभा चुनाव में वो डालटेनगंज से चुनाव लड़े और तीसरे नंबर पर रहे.
महामंत्रीः गणेश मिश्राः पार्टी में अच्छी पकड़ रखने वाले गणेश मिश्रा भी एक हारे हुए कैंडीडेट हैं. 2014 में जब बीजेपी ने बहुमत वाली सरकार बनायी, उसी चुनाव में वो हार गए.
उपाध्यक्षः सुनील सोरेनः लोकसभा चुनाव में टिकट कटने के बाद पार्टी की तरफ से दुमका विधानसभा का टिकट इन्हें मिला. लेकिन वो चुनाव हार गए.
उपाध्यक्षः गीता कोड़ाः कांग्रेस का दामन छोड़ने के बाद गीता कोड़ा पर बीजेपी ने काफी विश्वास जताया. पहले लोकसभा फिर उन्हें विधानसभा चुनाव में टिकट मिला. लेकिन दोनों चुनाव वो हार गयीं.
उपाध्यक्षः राकेश प्रसादः पार्टी में सम्मानित पद पर स्थापित राकेश प्रसाद ने 2005 के चुनाव में अपनी किस्मत आजमायी थी. रामगढ़ विधानसभा से चुनाव लड़ा. लेकिन वो सिर्फ 5000 वोट लाने में कामयाब हुए थे.
महासचिवः प्रदीप वर्माः राज्यसभा सांसद प्रदीप वर्मा का नाम पार्टी में भले ही एक बड़ा नाम हैं. लेकिन इन्होंने कभी चुनाव नहीं लड़ा. पार्टी में इस बात की चर्चा कार्यकर्ता करते हैं कि चुनावों में यह अपना बूथ भी नहीं बचा पाते हैं.
मंत्रीः दीलिप वर्माः पार्टी में मंत्री के पद पर कायम हैं. गाण्डेय उपचुनाव में वो कल्पना सोरेन से हार चुके हैं.
मंत्रीः सालीनी वेसखियारः जमीन से जुड़ा शायद ही कोई कार्यकर्ता इन्हें जानता हो. बिहार की राजनीति में हमेशा सक्रिय रहीं. पता नहीं फिर कैसे एक दिन वो झारखंड की बीजेपी पार्टी में मंत्री बन गयी.
मंत्रीः सुनिता सिंहः दूसरी बार मंत्री बनीं हैं. पहले माले में थी. फिर जेवीएम आयीं और फिर बीजेपी. वामपंथ से दक्षिण पंथ में आयीं सुनिता सिंह की सक्रियता से सभी वाकिफ हैं.
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