डिजिटल सिस्टम बना ‘पोषण का दुश्मन’! आंगनवाड़ी सेविकाएं बेहाल, बच्चे और महिलाएं अधिकार से वंचित

Ranchi: झारखंड में पोषण व्यवस्था की जमीनी हकीकत बेहद चिंताजनक तस्वीर पेश कर रही है. डिजिटल सिस्टम के नाम पर लागू की...

Ranchi: झारखंड में पोषण व्यवस्था की जमीनी हकीकत बेहद चिंताजनक तस्वीर पेश कर रही है. डिजिटल सिस्टम के नाम पर लागू की गई व्यवस्थाएं अब आंगनवाड़ी सेविकाओं के लिए मुसीबत बन गई हैं. हर दिन नौकरी जाने का डर, ऊपर से नेटवर्क और तकनीकी फेलियर—इन सबके बीच सबसे ज्यादा नुकसान उन बच्चों और महिलाओं को हो रहा है, जिन्हें पोषण मिलना चाहिए.

सर्वे में खुली जमीनी सच्चाई

भोजन का अधिकार अभियान के सर्वे ने इस संकट को उजागर किया है. नवंबर-दिसंबर 2025 में 9 जिलों—लोहरदगा, बोकारो, दुमका, खूंटी, पश्चिमी सिंहभूम, कोडरमा, पलामू, लातेहार और गिरिडीह—के 15 प्रखंडों में 106 आंगनवाड़ी केंद्रों का दौरा कर सेविकाओं से सीधी बातचीत की गई. सर्वे का मकसद था यह समझना कि पोषण योजनाएं जमीनी स्तर पर कितनी कारगर हैं, अंडा और THR (Take Home Ration) सही से मिल रहा है या नहीं, और e-KYC व फेस रिकग्निशन सिस्टम (FRS) जैसी डिजिटल व्यवस्थाएं कितना काम कर रही हैं.

अंडा योजना में बाधा, सेविकाओं पर आर्थिक बोझ

सरकारी निर्देश के अनुसार सप्ताह में 6 दिन अंडा देना अनिवार्य है, लेकिन सिर्फ 43% सेविकाएं ही इसे पूरा कर पा रही हैं. सरकार प्रति अंडा 6 रुपये देती है, जबकि बाजार दर इससे अधिक है. नतीजा—सेविकाएं खुद पैसे लगाकर अंडे खरीदती हैं और 2–3 महीने या उससे अधिक समय तक भुगतान का इंतजार करती हैं. देरी के कारण कई केंद्रों में अंडा वितरण बंद तक हो चुका है.

हालांकि, 97% सेविकाओं ने माना कि अंडा मिलने से बच्चों की उपस्थिति में साफ बढ़ोतरी होती है.

e-KYC बना सबसे बड़ा अवरोध

डिजिटल सत्यापन की प्रक्रिया e-KYC पोषण व्यवस्था के लिए बड़ी बाधा बन गई है. सर्वे के समय तक सिर्फ 56.1% लाभार्थियों का ही e-KYC पूरा हो सका था, जबकि लक्ष्य 1 जुलाई 2025 तक 100% कवरेज का था.

• 53% सेविकाओं ने बताया कि e-KYC में 10 मिनट से अधिक समय लगता है या प्रक्रिया फेल हो जाती है
• 92% सेविकाओं ने OTP देरी की शिकायत की
• आधार में गड़बड़ी और पुराने बायोमेट्रिक्स के कारण कई पात्र महिलाएं और बच्चे सेवाओं से बाहर हो रहे हैं

THR वितरण बाधित, कागजों में दिख रही आपूर्ति

सर्वे में सामने आया कि 87% आंगनवाड़ी केंद्रों में अक्टूबर/नवंबर में THR का वितरण नहीं हुआ. वजह संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही थी—टेंडर का नवीनीकरण ही नहीं किया गया.

चौंकाने वाली बात यह कि कुछ क्षेत्रों में पोषण ट्रैकर पर झूठी एंट्री दर्ज कर वितरण दिखाया गया.

FRS सिस्टम पूरी तरह फेल

चेहरा पहचान प्रणाली (FRS) ने हालात और खराब कर दिए हैं:

• 86% सेविकाओं ने खराब नेटवर्क की शिकायत की
• 41.5% मामलों में कैमरा चेहरा पहचानने में असफल
• 73.6% सेविकाओं का मानना—इससे काम और मुश्किल हुआ
• 52% सेविकाएं FRS बंद करने के पक्ष में

सबसे गंभीर पहलू—
30% से अधिक सेविकाओं ने बताया कि FRS काम नहीं करने पर वे THR बांट ही नहीं पातीं, जिससे छोटे बच्चे, गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाएं सीधे पोषण से वंचित हो जाती हैं.

साथ ही, 84% सेविकाओं ने कहा कि FRS अधूरा रहने पर उन्हें अधिकारियों के दबाव और कार्रवाई का सामना करना पड़ता है.

डिजिटल इंडिया बनाम जमीनी हकीकत

RTI से मिली जानकारी के अनुसार झारखंड के 575 गांव आज भी मोबाइल नेटवर्क और इंटरनेट से पूरी तरह वंचित हैं. विडंबना यह है कि सबसे ज्यादा जरूरत वाले इन्हीं इलाकों में डिजिटल सिस्टम लागू कर दिया गया है.

सेविकाओं पर बढ़ता काम का दबाव

पहले से पोषण ट्रैकर, e-KYC और FRS का दबाव झेल रहीं सेविकाओं पर अब BLO बनाकर विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) का अतिरिक्त काम भी थोप दिया गया है—वह भी बेहद कम मानदेय पर. इससे उनकी स्थिति और अधिक कठिन हो गई है.

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अभियान की प्रमुख मांगें

• THR आपूर्ति बहाल हो और जिन महीनों का वितरण नहीं हुआ, उसकी भरपाई की जाए
• FRS या e-KYC फेल होने पर राशन रोकना बंद किया जाए
• FRS सिस्टम तुरंत बंद किया जाए, क्योंकि यह 94% केंद्रों में समस्या पैदा कर रहा है
• अंडा वितरण के लिए अग्रिम भुगतान—कम से कम 2 महीने का—वास्तविक बाजार दर पर दिया जाए
• तकनीकी विफलताओं के लिए सेविकाओं को जिम्मेदार ठहराना बंद हो
• आंगनवाड़ी केंद्रों की बुनियादी सुविधाएं सुधारी जाएं—भवन, पानी, शौचालय और बिजली की व्यवस्था हो

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