Ranchi: झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने खूंटी जिले में एक आदिवासी महिला की कथित चिकित्सीय लापरवाही के कारण हुई मौत को लेकर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को पत्र लिखा है. अर्जुन मुंडा ने इस घटना को केवल एक अस्पताल की लापरवाही मानने से इनकार करते हुए इसे राज्य की पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था, संवैधानिक जवाबदेही और विशेषकर पांचवीं अनुसूची के मूल उद्देश्यों पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न बताया है. उन्होंने इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय और समयबद्ध जांच कराकर दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करने की मांग की है.
गलत ब्लड ग्रुप चढ़ाने से हुई मौत, व्यवस्था पर उठे सवाल
मुख्यमंत्री को भेजे पत्र में पूर्व सीएम अर्जुन मुंडा ने उल्लेख किया है कि खूंटी प्रखंड के बगडू ग्राम की रहने वाली एक आदिवासी महिला, स्वर्गीय बुधन पूर्ति को खूंटी के बिरसा इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस एंड रिसर्च सेंटर में भर्ती कराया गया था. इलाज के दौरान कथित तौर पर उन्हें गलत रक्त समूह का खून चढ़ा दिया गया, जिसके कारण उनकी मृत्यु हो गई. अर्जुन मुंडा ने कहा कि जिस चिकित्सा व्यवस्था पर एक मरीज अपना जीवन और विश्वास सौंपता है, उसी के द्वारा जीवन की रक्षा न हो पाना अत्यंत पीड़ादायक और दुर्भाग्यपूर्ण है.
पांचवीं अनुसूची और आदिवासी अस्मिता का दिया हवाला
अर्जुन मुंडा ने पत्र में झारखंड की भौगोलिक और सामाजिक संरचना का जिक्र करते हुए मुख्यमंत्री को याद दिलाया कि यह राज्य आदिवासी अस्मिता, सामाजिक न्याय और मानवीय मूल्यों के संरक्षण की पहचान रखता है. उन्होंने कहा कि संविधान निर्माताओं ने पांचवीं अनुसूची के माध्यम से आदिवासी समाज के जीवन, आजीविका और उनके समग्र कल्याण का जो दायित्व राज्य को सौंपा है, उसमें स्वास्थ्य एवं जीवन की सुरक्षा सर्वोपरि है. आज जब राज्य में पांचवीं अनुसूची और परिसीमन जैसे संवेदनशील विषयों पर व्यापक चर्चा हो रही है, तब ऐसी घटनाएं संवैधानिक संस्थाओं के प्रति आदिवासी समाज के विश्वास को हिलाकर रख देती हैं.
चाईबासा की पुरानी घटना का भी किया उल्लेख
स्वास्थ्य विभाग की बदहाली को रेखांकित करते हुए पूर्व मुख्यमंत्री ने अक्टूबर 2025 में पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) में हुई एक अन्य दुखद घटना का भी स्मरण कराया. उन्होंने याद दिलाया कि किस तरह वहां पांच मासूम थैलेसीमिया पीड़ित जनजातीय बच्चों को एचआईवी संक्रमित खून चढ़ा दिया गया था. मुंडा ने कहा कि ये घटनाएं दर्शाती हैं कि राज्य के स्वास्थ्य ढांचे में विभिन्न स्तरों पर व्यापक संस्थागत सुधारों और प्रभावी निगरानी तंत्र की भारी कमी है. यदि इन पर समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो इसका सबसे बुरा असर समाज के उस वंचित वर्ग पर पड़ेगा जिसे संविधान ने विशेष संरक्षण दिया है.
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उच्चस्तरीय जांच और संस्थागत सुधार की मांग
• इस पूरे प्रकरण की एक निष्पक्ष, उच्चस्तरीय और समयबद्ध जांच सुनिश्चित की जाए.
• घटना के जिम्मेदार दोषियों के खिलाफ विधिसम्मत और कठोरतम कार्रवाई हो.
• निजी और सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में रक्ताधान जैसी जीवनरक्षक प्रक्रियाओं के मानकों का कड़ाई से अनुपालन कराने के लिए एक प्रभावी व्यवस्था बने.
