Prerna Prabha
Ranchi: देश की सबसे प्रतिष्ठित चिकित्सा प्रवेश परीक्षा नीट यूजी एक बार फिर विवादों के चक्रव्यूह में है। वर्ष 2026 में परीक्षा रद्द होने के फैसले ने न केवल लाखों भविष्य के डॉक्टरों के सपनों पर पानी फेर दिया है, बल्कि राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) की शुचिता पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं. आखिर क्या कारण है कि कड़े सुरक्षा घेरे के बावजूद पेपर लीक का जिन्न बार-बार बाहर आ जाता है? आइए, चिकित्सा प्रवेश परीक्षाओं में धांधली और रद्दीकरण के इतिहास पर एक नजर डालते हैं.

इतिहास के पन्नों में दर्ज बड़ी गड़बड़ियां
2015: एआइपीएमटी का रद्दीकरण
नीट से पहले होने वाली ‘अखिल भारतीय पूर्व-चिकित्सा परीक्षा’ (एआइपीएमटी) 2015 में बड़े पैमाने पर धांधली की भेंट चढ़ गई थी. जांच में पाया गया कि अत्याधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और ब्लूटूथ के जरिए परीक्षा केंद्रों पर नकल कराई गई. मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा और ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने पूरी परीक्षा रद्द कर दी.
2024: ग्रेस मार्क्स और संदेह के घेरे में परिणाम
वर्ष 2024 की नीट परीक्षा सबसे अधिक विवादित रही. बिहार और अन्य राज्यों में प्रश्नपत्र लीक के दावों के साथ-साथ ‘ग्रेस मार्क्स’ (के असामान्य वितरण ने छात्रों को सड़कों पर उतरने को मजबूर कर दिया. हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय ने उस समय पूरी परीक्षा रद्द नहीं की, लेकिन 1,563 अभ्यर्थियों के लिए पुन: परीक्षा का आदेश दिया था.
2026: विश्वास का संकट और सीबीआई जांच
वर्तमान वर्ष 2026 में अनुमानित प्रश्नपत्र और लीक की खबरों ने आग में घी का काम किया. भारी विरोध प्रदर्शनों के बीच सरकार ने परीक्षा रद्द कर इसकी कमान केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआइ) को सौंप दी है.
अभ्यर्थियों के बीच गहराता आक्रोश
बार-बार परीक्षा रद्द होने और लीक की घटनाओं से छात्रों का मनोबल टूट रहा है. विशेषज्ञों का तर्क है कि जब तक डिजिटल सुरक्षा, परीक्षा केंद्रों की कड़ी निगरानी और प्रश्नपत्र वितरण के लिए अभेद्य तकनीक का उपयोग नहीं होगा, तब तक पारदर्शिता लाना एक चुनौती बनी रहेगी.यह केवल एक परीक्षा का रद्द होना नहीं है, बल्कि उन लाखों परिश्रमी छात्रों के वर्षों के संघर्ष और उनके माता-पिता की गाढ़ी कमाई का अपमान है.
सुधार की दरकार
अब गेंद सरकार और जांच एजेंसियों के पाले में है. नई परीक्षा तिथि की घोषणा के साथ ही यह सुनिश्चित करना होगा कि भविष्य में कोई भी नकल माफिया देश की स्वास्थ्य सेवा की नींव से खिलवाड़ न कर सके. चिकित्सा प्रवेश परीक्षा का जब-जब पारदर्शिता से समझौता हुआ, उसका खामियाजा केवल और केवल योग्य छात्रों को भुगतना पड़ा है.
