Hazaribagh: कभी अमन-चैन और सामाजिक सौहार्द के लिए पहचाने जाने वाले हजारीबाग में पिछले एक सप्ताह के दौरान सामने आई सात लावारिस शवों की घटनाओं ने समाज और प्रशासन दोनों को सोचने पर मजबूर कर दिया है. शहर और आसपास के अलग-अलग थाना क्षेत्रों से मिले इन शवों में पांच की पहचान अब तक नहीं हो सकी है. सभी अज्ञात शवों को शेख भिखारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल की मोर्चरी में सुरक्षित रखा गया है.
अज्ञात शवों की पहचान बनी बड़ी चुनौती
पुलिस अपने स्तर से सभी मामलों की जांच कर रही है, लेकिन अब तक अधिकांश शवों की पहचान नहीं हो पाई है. अगर समय पर परिजन सामने नहीं आते हैं तो नियमानुसार इन शवों का अंतिम संस्कार कर दिया जाएगा. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर वे लोग कौन थे, उनकी जिंदगी की कहानी क्या थी और क्यों वे इस तरह गुमनामी में चले गए.
अस्पताल परिसर से मिले दो शवों ने बढ़ाई चिंता
इन घटनाओं में सबसे गंभीर मामला शेख भिखारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल परिसर से दो अज्ञात शव मिलने का है. एक शव अस्पताल के वार्ड से मिला, जबकि दूसरा ट्रॉमा सेंटर के बाहर बरामद हुआ. अस्पताल जैसे संवेदनशील स्थान से शव मिलने की घटना ने सुरक्षा व्यवस्था और निगरानी तंत्र पर सवाल खड़े कर दिए हैं.
शहर के कई इलाकों में मिले शव
बीते सप्ताह जिन स्थानों से शव बरामद किए गए, उनमें झील स्थित मत्स्य विभाग परिसर, हीराबाग चौक के समीप बिजली विभाग कार्यालय के सामने का नाला, नगवां-चुरचू क्षेत्र की पत्थर माइंस, रेलवे स्टेशन की बोगी और अस्पताल परिसर शामिल हैं.इन सभी घटनाओं में एक समानता यह रही कि अधिकतर शव लावारिस अवस्था में मिले और उनकी पहचान अब तक नहीं हो सकी.
नीरज कुमार और टीम ने दिखाई इंसानियत
लावारिस शवों को सम्मानपूर्वक उठाने और उनकी पहचान के प्रयास में मुक्तिधाम सेवा संस्थान के सचिव एवं वार्ड पार्षद प्रतिनिधि नीरज कुमार और उनकी टीम ने अहम भूमिका निभाई. हीराबाग चौक के पास दलदल भरे नाले से शव निकालना बेहद चुनौतीपूर्ण था, लेकिन टीम ने कठिन परिस्थितियों में भी मानवता का परिचय दिया.यदि शवों की पहचान नहीं हो पाती है तो यही टीम उनका सम्मानपूर्वक अंतिम संस्कार भी करेगी.
सिर्फ अंतिम संस्कार नहीं, कारणों की पड़ताल जरूरी
इन घटनाओं ने यह सवाल भी खड़ा किया है कि क्या केवल लावारिस शवों का अंतिम संस्कार कर देना ही पर्याप्त है. जरूरत इस बात की है कि उन कारणों को समझा जाए जिनकी वजह से कोई व्यक्ति इस स्थिति तक पहुंचता है. मानसिक तनाव, आर्थिक परेशानी, नशे की लत, पारिवारिक विवाद और सामाजिक उपेक्षा जैसे कारणों की भी गंभीरता से समीक्षा करने की जरूरत है.
बढ़ती उदासीनता पर समाज से सवाल
आज के दौर में कई बार सड़क दुर्घटना के शिकार लोगों को मदद नहीं मिल पाती, बीमार लोगों को अस्पतालों के बाहर छोड़ दिया जाता है या अकेले रहने वाले लोगों की सुध लेने वाला कोई नहीं होता. यह स्थिति समाज में घटती संवेदनशीलता की ओर इशारा करती है.
प्रशासन के साथ समाज को भी निभानी होगी जिम्मेदारी
लोगों का मानना है कि सुनसान इलाकों, अस्पतालों और संवेदनशील स्थानों पर सीसीटीवी निगरानी मजबूत की जानी चाहिए. साथ ही बेसहारा और अज्ञात लोगों की पहचान, पुनर्वास और समय पर इलाज की व्यवस्था को बेहतर बनाने की जरूरत है.
हर लावारिस शव अपने साथ एक कहानी लेकर जाता है
हजारीबाग में सामने आई ये घटनाएं केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं हैं, बल्कि समाज के सामने एक बड़ा आत्ममंथन का विषय हैं. हर लावारिस शव अपने पीछे एक अधूरी कहानी छोड़ जाता है. जरूरत है कि इंसानियत, संवेदना और सामाजिक जिम्मेदारी को फिर से मजबूत किया जाए.
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